Old Parliament Building : देश को 28 मई को नई संसद मिल जाएगी। विपक्ष के विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनकर तैयार हुई इस नई इमारत का उद्घाटन करेंगे। नई संसद का निर्माण मौजूदा और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जाहिर है कि अब इसी संसद में देश के भविष्य की रूपरेखा बनेगी। तर्क-वितर्क एवं बहसें होंगी। यहीं से भारतीय लोकतंत्र नई कुलांचे भरेगा और 'न्यू इंडिया' के सपने साकार होंगे। संसदीय परंपरा और जीवंत लोकतंत्र की यह इमारत गवाह बनेगी। बावजूद इसके संसद की पुरानी इमारत का महत्व कम नहीं होगा।
पुरानी संसद का कालजयी इतिहास रहा है
सवाल है कि इस नई इमारत के बाद पुराने संसद भवन का क्या होगा? तो इसका जवाब गत मार्च में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दिया। उन्होंने राजयसभा के अपने संबोधन में बताया कि नए संसद भवन के निर्माण के बाद इस भवन की मरम्मत की जाएगी। इसे फिर से तैयार किया जाएगा। इस भवन के पुरातात्विक महत्त्व को देखते हुए सरकार इसे संरक्षित करेगी। बताया जाता है कि पुरानी संसद का इस्तेमाल संसद से जुड़े कार्यक्रमों के आयोजन के लिए होगा। 96 साल की हो चुकी पुरानी संसद का एक कालजयी इतिहास रहा है। पुरानी संसद ऐतिहासिक भाषणों, बहसों एवं घटनाओं का गवाह रही है।
83 लाख रुपए में बनकर तैयार हुआ था संसद भवन
पुरानी संसद का डिजाइन ब्रिटेन के आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हरबर्ट बेकर ने 1912-1913 के बीच तैयार किया। इसके बाद संसद भवन का निर्माण कार्य 1921 में शुरू हुआ और यह 1927 में बनकर तैयार हुआ। इस भवन की आधारशिला ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रादर्न के प्रिंस आर्थर ने फरवरी 1921 में रखी। संसद भवन को तैयार करने में करीब 6 साल का समय लगा। आगे चलकर साल 1956 में संसद भवन में दो और फ्लोर बनाए गए। संसद का निर्माण 790 सदस्यों के बैठने के हिसाब से किया गया। इस भवन के निर्माण में उस समय 83 लाख रुपए की लागत आई। जबकि नए संसद भवन के निर्माण में 970 करोड़ रुपए की लागत आई है।
1950 से पहले भवन में संविधान सभा की बैठकें होती थीं
संसद भवन का आकार गोल है। भवन के बाहरी हिस्से में चारों तरफ 144 स्तंभ हैं। इमारत के मध्य में गोलाकार सेंट्रल चैंबर है और इस चैंबर के आस-पास तीन अर्ध गोलाकार तीन हॉल हैं। चैंबर ऑफ प्रिंसेज हॉल का उपयोग लाइब्रेरी हॉल, स्टेट काउंसिल हॉल का इस्तेमाल राज्यसभा और सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली का उपयोग लोकसभा के लिए किया जाता रहा है। भारत में ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के बाद इस भवन का इस्तेमाल संविधान सभा करने लगी। साल 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद इस इमारत का उपयोग संसद के रूप में किया जाने लगा।
खट्टी-मीठे यादें समेटे है पुरानी संसद
पुरानी संसद खुद में खट्टी-मीठे यादें समेटे हुए है। साल 1973 में अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ बैलगाड़ी में सवार होकर संसद आए थे। वाजपेयी के नेतृत्व में विपक्ष का यह प्रदर्शन पेट्रोल एवं केरोसिन के दामों में वृद्धि के खिलाफ था। पुरानी संसद अपनी बहसों, तीखे सवालों और ऐतिहासिक विधेयक पारित करने के लिए हमेशा याद की जाएगी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद संसद भवन की सुरक्षा कई स्तरों में बढ़ा दी गई। इसी संसद में पीएम वाजपेयी का 1999 में ऐतिहासिक भाषण हुआ। दिसंबर 2001 में इसी संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। इस हमले में एक माली सहित नौ सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई। हमला करने आए पांच आतंकी भी मारे गए।
