Pawan Khera : पूर्व में पंजीकरण करा चुके मतदाताओं के नाम यदि मसौदा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सूची में नहीं हैं तो वे अपना नाम शामिल कराने के लिए फार्म-छह जमा कर सकते हैं, निर्वाचन आयोग की इस पहल पर कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेता ने बुधवार को कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) अब खुद के ही बनाए जाल में फंस गए हैं। SIR प्रक्रिया को लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने के बाद अब वे उस फैसले का बचाव करने में जुटे हैं, जिसका बचाव करना मुश्किल हो गया है। साथ ही, अब उसी प्रक्रिया में बदलाव किए जा रहे हैं, जिसे उन्होंने पहले पूरी तरह सही और त्रुटिरहित बताया था।
X पर अपने ट्वीट में पवन खेड़ा ने कहा कि अगर SIR को लेकर सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, तो फिर चुनाव आयोग अब उन बदलावों को वापस क्यों ले रहा है, जिन पर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साथी चुनाव आयुक्तों ने उन्हें 'अवैध' बताते हुए आपत्ति जताई थी? अगर कुछ भी गलत नहीं था, तो चुनाव आयोग अब सुधार किस चीज का कर रहा है? और अगर प्रक्रिया में सुधार की जरूरत थी, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ने पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने गलतबयानी क्यों की?
'इन बदलावों को अब वापस लिया जा रहा है?'
खेड़ा ने कहा, 'सबसे अहम सवाल यह है कि उन करोड़ों मतदाताओं का क्या होगा, जो फॉर्म-6 में किए गए इन 'अवैध और असंवैधानिक बदलावों' के कारण मतदान के अधिकार से वंचित रह गए और अब इन बदलावों को वापस लिया जा रहा है? बिहार, पश्चिम बंगाल और असम के उन लोगों को कौन मुआवजा देगा, जिन्होंने SIR की खामियों के कारण अपना वोट देने का मौका गंवा दिया? क्या इन राज्यों की विधानसभाएं भंग की जाएंगी? क्या लाखों लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने के बाद कराए गए चुनाव को वैध माना जा सकता है?'
अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता चुनाव आयोग
कांग्रेस नेता ने कहा कि 'माननीय सुप्रीम कोर्ट को इस गंभीर अन्याय का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। नुकसान हो जाने के बाद नियमों में चुपचाप बदलाव करके चुनाव आयोग अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता। ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना चाहिए!' दरअसल, ईसीआई का स्पष्टीकरण उन लोगों की चिंताओं के बीच आया है, जिनके नाम मसौदा एसआईआर सूची से हटा दिए गए हैं। उन्हें डर है कि फॉर्म छह जमा कराने पर की जाने वाली यह घोषणा झूठी घोषणा मानी जा सकती है कि आवेदक पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाना चाहता है। इसके लिए उसपर ’जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ के तहत कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
लोगों को घोषणा-पत्र भी देना है
सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में निर्वाचन आयोग ने कहा कि उसके संज्ञान में आया है कि मौजूदा विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में कुछ लोगों के नाम नहीं हैं और वे 'फॉर्म छह’ जमा करने में हिचकिचा रहे हैं क्योंकि उन्हें इस फॉर्म में एक घोषणा-पत्र भी देना है कि उनका नाम पहली बार मतदाता सूची में शामिल किया जा रहा है। उसने कहा, 'इसलिए, ऐसे मतदाताओं का मानना है कि पहले से पंजीकृत होने के बावजूद फॉर्म छह जमा करना एक झूठी घोषणा करने के समान होगा और इसके लिए वे 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 31 के तहत कानूनी कार्रवाई के भागी बन सकते हैं।’
'अपने आप में कोई झूठी घोषणा नहीं माना जाएगा'
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं के नाम मसौदा एसआईआर सूची में नहीं हैं, वे अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम फिर से शामिल कराने के लिए फॉर्म छह जमा कर सकते हैं, भले ही वे पहले से पंजीकृत रहे हों। उसने कहा कि जिन मामलों में मसौदा एसआईआर सूची से नाम हटा दिया गया था, वहां 'फॉर्म छह’ जमा करना अपने आप में कोई झूठी घोषणा नहीं माना जाएगा। निर्वाचन आयोग ने कहा कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ की धारा 31 के तहत चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) केवल इस आधार पर कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता कि कोई मतदाता, जो पहले से मतदाता सूची में शामिल था, उसने एसआईआर के दौरान या उसके बाद ’फॉर्म छह’ जमा किया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई तब तक नहीं की जा सकती, जब तक कि मतदाता कहीं और पंजीकृत न हो, या उसने कोई गलत या गैर-कानूनी घोषणा न की हो। निर्वाचन आयोग ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 14 अक्टूबर के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गलत घोषणा करने की आशंका निराधार थी।
