प्राचीन काल में ईरान का भारत के साथ गहरा सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध था। हजारों साल पहले, ईरान की सभ्यता वैदिक परंपरा से मिलती-जुलती थी और वहां पारसी (जोरोस्ट्रियन) धर्म से पहले वैदिक देवताओं की पूजा की जाती थी, जिसे कुछ इतिहासकार हिंदू धर्म के पूर्वज के रूप में देखते हैं। उस समय फारसी लोग अग्नि और अहुरा मज्दा (वरुण देवता के समान) की पूजा करते थे।
प्राचीन ईरान और भारत (वैदिक काल) एक ही सांस्कृतिक परिवार का हिस्सा थे, जिसे इंडो-ईरानियन या आर्य सभ्यता कहा जाता है। इसलिए, यह कहना सही है कि ईरान की जड़ें प्राचीन वैदिक सभ्यता (जिससे हिंदू धर्म विकसित हुआ) से जुड़ी हुई थीं।
पारसी धर्म के 'अहुरा मज्दा' और 'आहरीमनन' की अवधारणा और वैदिक अग्नि पूजा में समानताएं हैं। 'हिंदू' शब्द फारसी भाषा से ही आया है, जहां पुरानी ईरानी भाषा में 'स' (S) को 'ह' (H) कहा जाता था, इसलिए 'सप्तसिंधु' (भारत का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र) 'हप्त हिंदू' बन गया।
पारसी धर्म के उदय से पहले ईरान में वैदिक देवी-देवताओं की पूजा प्रचलित थी। पारसी धर्म की स्थापना पैगंबर जरथुष्ट्र ने की थी। तब यह समूचे ईरान में फैला हुआ था।
बाद में पारसी धर्म के आने और फिर 7वीं शताब्दी में इस्लाम के आने के बाद वहां की संस्कृति पूरी तरह बदल गई। तलवार की ताकत पर इस्लाम पूरे ईरान में फैल गया। आज यहां पारसी धर्म का नामोंनिशान ही मिट गया है।
पारसी धर्म न तो हिंदू है और न ही मुस्लिम। यह पारसी धर्म (Zoroastrianism) नामक एक अलग, स्वतंत्र और दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। पारसी लोग मूल रूप से फारस (आधुनिक ईरान) के रहने वाले थे, जो इस्लाम के आने के बाद भारत आ गए थे। इसके अनुयायी अग्नि की पूजा करते हैं, जिसे वे पवित्र मानते हैं।