हिमालय की ऊंची चोटियों पर मौजूद ग्लेशियर सिर्फ बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं, बल्कि ये नदियों और झीलों के भी स्रोत हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो उनके आसपास पानी जमा होने लगता है। धीरे-धीरे यह पानी विशाल झील का रूप ले लेता है। इन्ही विशाल झीलों को ग्लेशियल लेक (Glacial Lake) कहा जाता है। चिंता की बात यह है कि इन झीलों का पानी हमेशा सुरक्षित नहीं रहता। कई बार प्राकृतिक बांध टूटने से कुछ ही घंटों में पानी का विशाल सैलाब नीचले इलाकों की ओर बढ़ जाता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहते हैं।
हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की घटनाएं भारत सहित कई देशों के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं। इनमें नेपाल और भूटान के साथ चीन प्रमुख देश हैं। सवाल है कि आखिर ग्लेशियल लेक बनती कैसे हैं, इनके फटने की नौबत क्यों आती है और क्या इनका खतरा पहले से पहचाना जा सकता है?
Glacial Lake कैसे बनती हैं?
ग्लेशियल लेक को समझने के लिए पहले ग्लेशियर को समझना जरूरी है। ग्लेशियर पहाड़ों पर हजारों साल से जमा बर्फ का विशाल भंडार होते हैं। ये धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते हैं और रास्ते में चट्टानों को घिसकर गहरी घाटियां और गड्ढे बना देते हैं।
जब तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने लगते हैं तो उसके पीछे हटने से खाली हुई जगह में पानी जमा होने लगता है। इसके अलावा ग्लेशियर की बर्फ पिघलने से निकलने वाला पानी भी इन गड्ढों में इकट्ठा होता रहता है। धीरे-धीरे यह पानी एक बड़ी झील का रूप ले लेता है।
इस प्रक्रिया में ग्लेशियर द्वारा पीछे छोड़े गए पत्थर, मिट्टी, रेत और बड़े-बड़े बोल्डर भी अहम भूमिका निभाते हैं। इन्हें मोरेन (Moraine) कहा जाता है। कई बार यही मोरेन झील के सामने प्राकृतिक बांध की तरह काम करते हैं और पानी को रोककर रखते हैं।
मुख्यत: चार तरह की हो सकती हैं ग्लेशियल लेक
- Moraine-dammed Lake: ग्लेशियर के पीछे छोड़े गए पत्थर, मिट्टी और मलबे से बना प्राकृतिक बांध पानी को रोकता है।
- Ice-dammed Lake: ग्लेशियर की बर्फ ही पानी के लिए प्राकृतिक अवरोध बन जाती है और बड़ी मात्रा में पानी को रोक लेती है।
- Erosion Lake: ग्लेशियर के कटाव से बने गहरे गड्ढों में पानी जमा होने से झील बनती है।
- Other Glacial Lake: ग्लेशियर से जुड़ी दूसरी भूगर्भीय और प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बनने वाली झीलें।

ग्लेशियल लेक में भारी मात्रा मे पानी जमा होता है
ग्लेशियल लेक क्यों फटती हैं?
ग्लेशियल लेक का फटने के लिए हमेशा किसी एक कारण को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कई बार प्राकृतिक घटनाओं की एक श्रृंखला झील के कमजोर बांध को तोड़ देती है। इसके प्रमुख कारण हैं -
- ग्लेशियर का तेजी से पिघलना : ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं। इससे झील में पानी की मात्रा बढ़ती है और प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ने से उसके फटने का खतरा भी बढ़ जाता है।
- एवलांच और लैंडस्लाइड : पहाड़ों से बर्फ, चट्टान या भारी मलबा अचानक झील में गिरता है तो पानी में बड़ी लहरें पैदा होती हैं। ये लहरें झील के प्राकृतिक बांध को पार करके या तोड़कर पानी को बाहर निकाल सकती हैं।
- प्राकृतिक बांध का कमजोर होना : मोरेन से बने बांध पत्थर, मिट्टी और बर्फ के मलबे से बने होते हैं। इनमें सीमेंट की तरह कोई मजबूत संरचना नहीं होती। पानी लगातार रिसने से बांध अंदर से कमजोर हो सकता है और कभी भी अचानक टूट सकता है।
- बादल फटना और भारी बारिश : अत्यधिक बारिश से झील में पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। इससे बांध के ऊपर से पानी बहने लगता है। लगातार बहाव प्राकृतिक बांध को काटकर कमजोर कर सकता है।
- भूकंप और बर्फ का टूटना : भूकंप से पहाड़ों और झील के आसपास की जमीन में अस्थिरता पैदा हो सकती है। ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर झील में गिरने से भी विनाशकारी लहरें उठ सकती हैं जो प्राकृतिक बांध को तोड़ सकती हैं।
हाल की इन घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
30 अक्टूबर 2026 को भूटान की सिंटाफू (Sintaphu) झील में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की घटना सामने आई। इसके बाद भारत के पश्चिम बंगाल और असम में अलर्ट जारी करना पड़ा। संकोश नदी का जलस्तर लगभग दो फीट बढ़ने के बाद संवेदनशील इलाकों में लोगों को सतर्क किया गया और बचाव दल तैनात किए गए। इस घटना ने एक बार फिर साफ कर दिया कि हिमालयी क्षेत्र में होने वाली ऐसी आपदाओं का असर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक पहुंच सकता है।
इससे पहले 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में आई विनाशकारी बाढ़ ने भी ग्लेशियल लेक और हिमालयी आपदाओं के खतरे को चर्चा में ला दिया था। भारत में इसका सबसे बड़ा उदाहरण 3-4 अक्टूबर 2023 को सिक्किम की साउथ ल्होनाक झील में हुआ हादसा है। झील का बांध टूटने से तीस्ता नदी में अचानक बाढ़ आ गई थी। इस आपदा में 26 लोगों की मौत हुई, 143 से ज्यादा लोग लापता हो गए थे। इस हादसे में भारी नुकसान हुआ था।
हिमालय में कितनी तेजी से बढ़ रही हैं ग्लेशियल झीलें?
ISRO के अप्रैल 2024 के अध्ययन के मुताबिक, भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 2016-17 के दौरान 10 हेक्टेयर से बड़ी 2431 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 676 झीलों का आकार 1984 के मुकाबले बढ़ा है। इनमें 130 झीलें भारत के हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं।
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यह आंकड़ा बताता है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ पिघलने से पहाड़ों में जलाशय बढ़ रहे हैं। हालांकि, हर ग्लेशियल झील खतरनाक नहीं होती। झील का आकार, उसमें मौजूद पानी की मात्रा, प्राकृतिक बांध की बनावट, आसपास की ढलान और नीचे बसे इलाकों की स्थिति मिलकर खतरे का स्तर तय करते हैं।
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ग्लेशियल लेक फटने की भविष्यवाणी की जा सकती है?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी और समय रहते चेतावनी देकर नुकसान कम किया जा सकता है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय जरूरी हैं।
- सैटेलाइट निगरानी : ISRO और अन्य वैज्ञानिक संस्थाएं सैटेलाइट तस्वीरों से झीलों के आकार, जलस्तर और ग्लेशियरों में होने वाले बदलावों पर नजर रख सकती हैं।
- अर्ली वार्निंग सिस्टम : संवेदनशील झीलों के आसपास जलस्तर और पानी के बहाव की निगरानी के लिए सेंसर लगाए जाने चाहिए, ताकि अचानक बदलाव का अलर्ट मिल सके।
- प्राकृतिक बांधों की जांच : मोरेन बांधों में दरार, पानी का रिसाव और जमीन धंसने जैसी गतिविधियों की नियमित जांच जरूरी है।
- सुरक्षित निर्माण : नदियों के किनारे और संभावित बाढ़ के रास्तों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए निकासी योजना हमेशा तैयार होनी चाहिए।
