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गोडसे भारत के सपूत, बाबर की औलाद...केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का ओवैसी पर हमला

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jun 10, 2023, 09:20 AM IST

केंद्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बयान में कहा है कि अगर गोडसे गांधी के हत्यारे हैं तो वह भारत के सपूत भी हैं। वो इसी भारत में ही पैदा हुए हैं। औरंगजेब और बाबर की तरह वह आक्रांता नहीं थे।

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केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह

Photo : BCCL

Aurangzeb Controversy: औरंगजेब ओर गोडसे के नाम पर शुरू हुई सियासत में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी कूद पड़े हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ में विवादित बयान दिया है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि अगर गोडसे महात्मा गांधी का हत्यारा है तो वह भारत का सपूत भी है। वह इसी भारत में पैदा हुए थे।

केंद्रीय मंत्री का यह बयान एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की गोडसे को लेकर की गई टिप्पणी के बाद आई है। बता दें, पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने औरंगजेब का लेकर टिप्पणी की थी, जिस पर ओवैसी ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी।

बाबर की औलाद भारत माता के सपूत नहीं

केंद्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बयान में कहा है कि अगर गोडसे गांधी के हत्यारे हैं तो वह भारत के सपूत भी हैं। वो इसी भारत में ही पैदा हुए हैं। औरंगजेब और बाबर की तरह वह आक्रांता नहीं थे। जिसको बाबर की औलाद कहलाने में खुशी महसूस होती है तो कम से कम भारत माता का सही सपूत नहीं हो सकता है।

क्या है पूरा मामला

दरअसल, हाल ही में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने औरंगजेब को लेकर एक बयान दिया था। उन्होंने राज्य में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए कहा था कि यहां औरंगजेब की औलादों ने जन्म लिया है। जिस पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का बयान सामने आया था। उन्होंने फडणवीस पर निशाना साधते हुए कहा था कि गोडसे की औलाद कौन है, जिसके बाद विवाद पूरी तरह से बढ़ गया।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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