महाराष्ट्र विधानसभा ने सोमवार रात धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 (Freedom of Religion Bill 2026) को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस कानून में जबरन, धोखाधड़ी, लालच या विवाह के जरिए किए जाने वाले धर्मांतरण पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। नए कानून के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को शादी के बहाने या धोखे से धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है, तो दोषी को सात साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
सात से 10 साल तक की सजा का प्रावधान
इसके अलावा यदि धर्मांतरण का मामला नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति या अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति से जुड़ा हो,तो सजा और कड़ी होगी। ऐसे मामलों में सात साल तक की जेल और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। कानून में सामूहिक धर्मांतरण को भी गंभीर अपराध माना गया है। ऐसे मामलों में भी सात साल तक की जेल और पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति बार-बार ऐसे अपराध में शामिल पाया जाता है तो उसे 10 साल तक की सजा हो सकती है।
इस बिल पर विधानसभा में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य केवल ऐसे धर्मांतरण को रोकना है जो बल, धोखे या लालच के जरिए कराए जाते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन किसी को दबाव या प्रलोभन देकर धर्म बदलवाना इस अधिकार के दायरे में नहीं आता।
इन राज्यों में पहले ही लागू है कानून
फडणवीस ने यह भी कहा कि देश के कई राज्यों जैसे ओडिशा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और झारखंड में पहले से ही इसी तरह के कानून लागू हैं। महाराष्ट्र में भी इस तरह के कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी।
60 दिन पहले सूचना देने का प्रावधान
विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले सूचना देनी होगी।
धर्म परिवर्तन के बाद 21 दिनों के भीतर प्रशासन को इसकी सूचना देना जरूरी
विपक्ष के आरोपों पर गृह राज्य मंत्री पंकज भोयर ने कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि धर्मांतरण स्वेच्छा से और पारदर्शी तरीके से हो रहा है, न कि किसी दबाव या धोखे के कारण। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद 21 दिनों के भीतर प्रशासन को इसकी सूचना देना जरूरी होगा,ताकि प्रशासनिक रिकॉर्ड बनाए रखे जा सकें और भविष्य में किसी विवाद की स्थिति न बने।
शिकायत कौन कर सकता है?
कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति के साथ जबरन धर्मांतरण का मामला सामने आता है तो पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार के सदस्य, करीबी रिश्तेदार शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा जबरन धर्म परिवर्तन के कुछ मामलों में पुलिस भी स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकती है।
कानून का उद्देश्य
- जबरन धर्मांतरण रोकना
- महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना
- धोखाधड़ी या लालच के जरिए धर्म बदलवाने की घटनाओं पर रोक लगाना
शिवसेना (UBT) ने दिया समर्थन
इस विधेयक को लेकर दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष में रहते हुए भी शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट)ने इस विधेयक का समर्थन किया। पार्टी विधायक भास्कर जाधव ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य किसी धर्म को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि लोगों को अवैध और अनैतिक धर्मांतरण से बचाना है। उन्होंने कहा कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी धर्म परिवर्तन केवल स्वेच्छा से ही हो।
विपक्ष ने उठाए सवाल
कुछ विपक्षी विधायकों ने इस प्रावधान पर सवाल उठाए और कहा कि यह नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। कांग्रेस विधायक असलम शेख ने कहा कि इस कानून से संविधान में दिए गए निजता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर असर पड़ सकता है। समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आजमी और रईस शेख ने भी इसका विरोध किया और कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ है।
