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'आतंकियों के जनाजे में न जाएं...' RSS नेता की सलाह- हिंदुओं को आत्मरक्षा के लिए घर में रखने चाहिए तलवारें और चाकू

पहलगाम हमले के बाद पूरा देश आक्रोशित है। एक तरफ इंद्रेश कुमार की मुसलमानों से अपील की है कि आतंकियों के जनाजे में न जाएं, दफनाने की जगह भी न दें। वहीं दूसरी ओर आरएसएस नेता के. प्रभाकर भट ने कहा है कि हिंदुओं को आत्मरक्षा के लिए घर में तलवारें और चाकू रखने चाहिए।

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RSS नेताओं ने हिंदुओं और भारतीय मुसलमानों को दी ये सलाह।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार ने मंगलवार को जम्मू के पहलगाम आतंकवादी हमले की निंदा करते हुए मुसलमानों से अपील की कि वे आतंकियों के अंतिम संस्कार में न जाएं और न ही उन्हें कब्रगाह में जगह दें। उन्होंने कहा कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता और उन्हें धर्म से जोड़ना गलत है।

आरएसएस नेता ने मुसलमानों से कही ये बड़ी बात

इंद्रेश कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'जब उनके लिए नमाज अदा की जाती है, कब्र दी जाती है या जनाजे में शिरकत की जाती है, तो यह संकेत देता है कि वे किसी धर्म के प्रतिनिधि हैं, जो पूरी तरह गलत है।' कुमार ने कहा कि अगर 20–30 साल पहले यह कठोर निर्णय लिया गया होता तो जम्मू-कश्मीर की स्थिति कुछ और होती।

भारतीय मुसलमानों से इंद्रेश कुमार की खास अपील

उन्होंने पहलगाम में एक स्मारक बनाने का प्रस्ताव दिया, जिससे पाकिस्तान की बर्बरता को उजागर किया जा सके। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अब टूटने की कगार पर है और सिंध, बलूचिस्तान, पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर समेत कई हिस्से आज़ादी मांग रहे हैं। उन्होंने भारतीय मुसलमानों से वोट बैंक की राजनीति को त्यागने और देशहित में सोचने का आह्वान किया।

हिंदुओं को घर में तलवार और चाकू रखने की सलाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता के. प्रभाकर भट ने हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का हवाला देते हुए सुझाव दिया कि 'हिंदुओं को आत्मरक्षा के लिए घर में तलवार और चाकू रखने चाहिए।' केरल के कासरगोड जिले के मंजेश्वर के वर्कडी में सोमवार को एक कार्यक्रम में भट ने कहा, 'हर हिंदू के घर में तलवार होनी चाहिए। अगर पहलगाम हमले के दौरान हिंदुओं ने तलवार दिखाई होती, तो वह काफी होता।' उन्होंने महिलाओं से भी आग्रह किया कि वे अपने बैग में सामान्य सामान के साथ चाकू भी रखें।

आरएसएस नेता ने दावा किया कि छह इंच का चाकू रखने के लिए 'लाइसेंस' की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा, 'अगर आप शाम के बाद बाहर हैं, तो हमला होने की पूरी संभावना है। हमलावरों से विनती न करें - बस चाकू दिखाएं और वे भाग जाएंगे।' पिछले सांप्रदायिक तनावों का जिक्र करते हुए भट ने कहा, 'पहले हिंदू-मुस्लिम झड़पों के दौरान हिंदू भाग जाते थे। अब यह बदल रहा है। हमें उठ खड़ा होना चाहिए और हर किसी को घर पर तलवार रखनी चाहिए।' इस टिप्पणी पर अभी तक पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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