प्रतीकात्मक फोटो (istock)
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को वह नकद रकम और सोने के गहने वापस पाने का पूरा हक है, जो उसके पिता ने शादी के समय उसके पति को दिए थे। यह राशि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के दायरे में आती है।
यह मामला पश्चिम बंगाल की रौशनारा बेगम से जुड़ा है, जिनकी शादी अगस्त 2005 में हुई थी। कुछ समय बाद ही संबंध बिगड़ गए और मई 2009 में वह ससुराल छोड़कर मायके चली गईं। दिसंबर 2011 में तलाक हो गया। तलाक के बाद उन्होंने 1986 के कानून की धारा 3 के तहत दावा दायर कर 17 लाख 67 हजार 980 रुपये और 30 भोरी सोने के गहनों की वापसी मांगी।
रौशनारा ने दावा किया था कि उनके पिता ने शादी के समय पति को 7 लाख रुपये नकद और 30 भोरी सोना दिया था, जिसकी प्रविष्टि क़ाबिलनामा (निकाह रजिस्टर) में भी दर्ज है।
लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस दावे को इसलिए खारिज कर दिया कि क़ाज़ी और पिता के बयानों में थोड़ी असंगति थी। काज़ी ने कहा कि रजिस्टर में राशि तो दर्ज है पर यह नहीं लिखा कि किसे दी गई। वहीं पिता ने तलाक के बाद दायर एक केस में कहा था कि यह राशि दामाद को दी गई थी।
निचली अदालतों ने महिला के पक्ष में फैसला दिया था महिला में इस मामले ने कई अदालतों के चक्कर लगाए। जिसमें-
1. ACJM ने 2014 में महिला को 8.3 लाख रुपये देने का आदेश दिया।
2. मुकदमा दो बार सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।
3. 2017 में कोर्ट ने मूल क़ाबिलनामा देखकर 7 लाख रुपये और 30 भोरी सोना लौटाने का आदेश दिया।
4. सेशन्स कोर्ट ने भी 2018 में महिला के पक्ष में फैसला बरकरार रखा।
लेकिन 2022 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह आदेश पलट दिया।
हाई कोर्ट की दलीलें सुप्रीम कोर्ट को गलत लगीं
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने पूरे मामले को सिर्फ एक सिविल विवाद की तरह देखा और कानून के उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।
पीठ ने कहा कि पिता का बयान 498A और दहेज निषेध कानून से जुड़े मामले में दिया गया था, जिसमें पति बरी हो चुका है। इसलिए उस बयान को शादी रजिस्टर रखने वाले गवाह की आधिकारिक गवाही से ऊपर नहीं माना जा सकता।
काज़ी ने अदालत में मूल रजिस्टर पेश किया था और यह भी स्पष्ट किया कि ओवरराइटिंग गलती से हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शक के आधार पर रजिस्ट्रार की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने 1986 के कानून की धारा 3(1)(d) का विस्तृत अर्थ बताते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य तलाकशुदा मुस्लिम महिला की आर्थिक सुरक्षा करना है।
कानून के अनुसार तलाकशुदा महिला को हक है कि उसे वह संपत्ति वापस मिले जो:
1. शादी से पहले,
2. शादी के समय, या
3. शादी के बाद उसे उसके रिश्तेदारों, दोस्तों या पति की ओर से दी गई हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी में दिए गए पैसे और सोना महिला की "भविष्य की सुरक्षा" के लिए होते हैं, इसलिए तलाक के बाद उसे वापस मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में सामाजिक यथार्थ और महिलाओं के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए फैसला देना चाहिए।
अदालत ने जोर देते हुए कहा, 'भारत का संविधान समानता का अधिकार देता है। महिलाओं की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर 1986 के कानून का अर्थ तय होना चाहिए।'
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाओं को भेदभाव और आर्थिक निर्भरता का सामना करना पड़ता है, इसलिए अदालतों की भूमिका संवेदनशील होनी चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने हाई कोर्ट का निर्णय रद्द करते हुए महिला के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि पति 7 लाख रुपये और 30 भोरी सोने के गहने का मूल्य सीधे महिला के बैंक खाते में जमा करे। महिला तीन कार्यदिवस में अपने बैंक खाते की जानकारी साझा करेगी।
राशि छह सप्ताह में न जमा करने पर 9% वार्षिक ब्याज लगेगा। इसके साथ ही पति को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन का हलफनामा भी जमा करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ इस मामले के लिए बल्कि ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां तलाक के बाद महिलाओं को शादी में मिली संपत्ति वापस पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि:
कानून का उद्देश्य महिलाओं के हक की रक्षा करना है,
1. शादी के समय दिया गया धन और गहने महिला की संपत्ति माने जाएंगे,
2. अदालतें केवल तकनीकी आधार पर महिलाओं के दावों को खारिज नहीं कर सकतीं।
यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को और मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि तलाक के बाद भी उनकी आर्थिक गरिमा कानून द्वारा सुरक्षित है।
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