Delhi Protest: दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका पर 23 अक्टूबर को सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने ''शांति बनाए रखने के लिए'' विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के समक्ष उन्हें एक बॉण्ड भरने को कहे जाने संबंधी दिल्ली पुलिस के नोटिस को चुनौती दी है।
कब आएगा फैसला?
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) की अध्यक्ष बोरा के वकील और पुलिस की दलीलें लगभग तीन घंटे तक सुनने के बाद, याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। न्यायाधीश ने कहा, ''मैं कल शाम 6 बजे आदेश सुनाऊंगा।''
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाली बोरा ने इस नोटिस को रद्द किए जाने और पुलिस को यह निर्देश देने का अनुरोध किया है कि उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न की जाए।
हाई कोर्ट में बहस के दौरान, बोरा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करते समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि महज 'कट-एंड-पेस्ट' किया।
दिल्ली पुलिस के उस नोटिस का जिक्र करते हुए, जिसमें कहा गया था कि बोरा ने बिना अनुमति लिए राष्ट्रीय ध्वज फहराया, वकील ने दलील दी कि नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
'राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं'
समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक, शंकरनारायणन ने दलील दी, ''सवाल यह है कि क्या इस (नोटिस) में कोई दम है? राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए हमें किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। उन्हें कानून का अध्ययन करने की आवश्यकता है।''
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बोरा की याचिका की विचारणीयता पर आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि नोटिस जारी करते समय, मजिस्ट्रेट के पास पर्याप्त सामग्री मौजूद थी और उन्होंने उस पर विचार किया था।
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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत 17 अक्टूबर को जारी नोटिस में, छात्र नेता से कहा गया कि वह 19 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश हों और कारण बताएं कि ''जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए'' उनसे 10,000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार क्यों न लिया जाए।
धारा 126
धारा 126 मजिस्ट्रेट को ऐसे बॉण्ड पर हस्ताक्षर करवाने का अधिकार देती है, बशर्ते कि इस बारे में विश्वसनीय जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डाल सकता है, या कोई ऐसा गलत काम कर सकता है जिससे अशांति पैदा हो सकती है।
बोरा को 16 अक्टूबर को एहतियातन हिरासत में ले लिया गया था, जब वह 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जा रही थीं। उन्हें 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया था।
'तथ्यों के लिहाज से गलत है पुलिसिया नोटिस'
वकील अभिक चिमनी द्वारा तैयार की गई अपनी याचिका में, बोरा ने कहा है कि पुलिस का नोटिस अस्पष्ट है, तथ्यों के लिहाज से गलत है, और इसमें ऐसी कोई सामग्री या जानकारी नहीं है जो शांति भंग होने की ''संभावना'' को साबित कर सके।
याचिका में दलील दी गई कि इसमें ''ऐसी कोई अवधि, अवसर या घटना'' नहीं बताई गई है, जिसे लेकर उल्लंघन की आशंका हो। साथ ही, यह भी कहा गया है कि यह कार्रवाई ''शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिए निवारक शक्तियों का एक छद्म तरीके से इस्तेमाल" है, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए), 19(1)(बी) और 21 का उल्लंघन है।
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष जारी कार्यवाही, 16 अक्टूबर को मंडी हाउस पर नारेबाजी करने के आरोपों, बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार विरोध-प्रदर्शन करने, और 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाने पर आधारित है।
