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दिमाग काम नहीं कर रहा था, किसी का हाथ नहीं था तो किसी का पैर....ओडिशा ट्रेन हादसे के बाद चश्मदीदों ने क्या-क्या कहा?

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jun 3, 2023, 08:28 AM IST

COROMANDEL EXPRESS DERAILMENT: ट्रेन में सफर कर रहे एक अन्य यात्री ने बातया, जब तक हम लोग कुछ समझ पाते, बोगियां आपस में चिपक चुकी थीं। इतने लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे कि समझ नहीं आ रहा था कि किस-किस को बचाया जाए। जब हादसा हुआ, तब वहां कोई नहीं था। यात्री ही एक-दूसरे को बचा रहे थे।

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ट्रेन हादसे के बाद अस्पताल के बाहर खून देने वालों की भीड़

Photo : ANI

COROMANDEL EXPRESS DERAILMENT:'मैं सोया हुआ था। अचानक तेज आवाज हुई और नींद खुल गई। मैंने देखा ट्रेन पटरी से उतरकर नीचे की तरफ जा रही है। लोग चिल्ला रहे हैं...मुझे बचाओ-मुझे बचाओ। जब तक कुछ समझ आता, ट्रेन की कैंटीन में आग लग गई और हम लोग वहां से भाग गए...'

ये शब्द कोरोनामंडल एक्सप्रेस में सफर कर रहे एक यात्री के हैं। जिस समय यह हादसा हुआ, पूरी ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी। ट्रेन के पटरी से उतरते हुए कई लोग बोगियों में ही फंस गए और उनकी मौत हो गई। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस हादसे में अब तक 233 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि सभी जीवित बचे लोगों को बाहर निकाल लिया गया है। अब बोगियों से शवों को निकालने का काम किया जा रहा है।

आपस में चिपक चुकी थी बोगियां

ट्रेन में सफर कर रहे एक अन्य यात्री ने बातया, जब तक हम लोग कुछ समझ पाते, बोगियां आपस में चिपक चुकी थीं। इतने लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे कि समझ नहीं आ रहा था कि किस-किस को बचाया जाए। जब हादसा हुआ, तब वहां कोई नहीं था। यात्री ही एक-दूसरे को बचा रहे थे। वहीं एक स्थानीय नागिरक ने बताया, हादसे के वक्त हम यहां से 200 मीटर दूर मार्केट में थे, दुर्घटना की आवाज आई तो हम यहां पहुंचे। लोगों को अंदर से निकाला।

किसी का हाथ नहीं था तो किसी पैर

एक अन्य यात्री ने बताया, हम हादसे के वक्त S5 बोगी में थे और जिस समय हादसा हुआ उस उस समय मैं सोया हुआ था... हमने देखा कि किसी का सर, हाथ, पैर नहीं था। हमारी सीट के नीचे एक 2 साल का बच्चा था जो पूरी तरह से सुरक्षित है। बाद में हमने उसके परिवारिजन को बचाया।

अस्पतालों में खून देने वालों की लंबी लाइन

रेल हादसे में अब तक करीब 900 घायलों को निकाला जा चुका है। ओडिशा के मुख्य सचिव प्रदीप जेना ने बताया, घायलों को इलाज के लिए गोपालपुर, कांतापाडा, बालासोर, भद्रक और सोरो के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अस्पतालों के बाहर खून देने वालों की लंबी लाइन मौजूद है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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