हरियाणा सरकार के शहरी स्थानीय निकाय ने छोटे शहरों में अवैध कॉलोनियों (Unauthorized Colonies) पर पूरी तरह नकेल कसने और नियोजित विकास को बढ़ावा देने के लिए एक नई 'टाउन प्लानिंग स्कीम' लेकर आई है। इसके तहत राज्य के 62 से अधिक छोटे नगरों व नगरपालिकाओंको कवर किया गया है। इस नई नीति से जहां एक ओर अवैध कॉलोनाइजरों का खेल खत्म होगा, वहीं आम नागरिकों को वैध और आधुनिक सुविधाओं वाले प्लॉट खरीदने का मौका मिलेगा।
सरकार ने खुद माना है कि ऐसे नगरों में रेजीडेंशियल प्लॉट हाउसिंग के लिए टाउन प्लानिंग स्कीम नहीं होने के कारण लोगों की आवास जरूरतें अक्सर अनऑथराइज्ड कॉलोनियों के जरिए पूरी होती हैं। नई नीति का मकसद नियोजित आवास, समय पर जमीन की उपलब्धता, प्लानिंग अप्रूवल को आसान बनाना और निजी निवेश को बढ़ावा देना है।
कम से कम 5 एकड़ जमीन पर बनेगी कॉलोनी
नई योजना के तहत किसी प्रोजेक्ट के लिए कम से कम 5 एकड़ जमीन जरूरी होगी। अधिकतम जमीन की कोई सीमा तय नहीं की गई है। साथ ही प्रोजेक्ट तक पहुंचने के लिए कम से कम 33 फीट चौड़ी मौजूदा सार्वजनिक सड़क या रेवेन्यू रास्ता होना जरूरी होगा।
प्लॉट की बात करें तो इनका न्यूनतम आकार 50 वर्ग मीटर और अधिकतम आकार 250 वर्ग मीटर रखा गया है। खास बात यह है कि कुल रेजीडेंशियल प्लॉट में कम से कम 50 फीसदी प्लॉट ऐसे होने चाहिए जिनका आकार अधिकतम 150 वर्ग मीटर हो। इससे छोटे और मध्यम आकार के प्लॉट को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
सड़क, सीवर और पानी की जिम्मेदारी डेवलपर की
इस योजना की एक बड़ी खासियत यह है कि डेवलपर को कॉलोनी की आंतरिक सुविधाओं की व्यवस्था खुद करनी होगी। इसमें सड़क, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइट, पानी की सप्लाई, सीवर, ड्रेनेज और जरूरी अन्य सुविधाएं शामिल हैं। इंटरनल रोड की न्यूनतम चौड़ाई 10 मीटर रखी गई है। इसके अलावा ग्राउंड कवरेज, FAR, बेसमेंट, हाईट और पार्किंग जैसे नियम हरियाणा बिल्डिंग कोड, 2017 के अनुसार लागू होंगे।
सामुदायिक सुविधाएं के लिए 5 फीसदी जमीन
नई योजना में डेवलपर को कुल प्रोजेक्ट एरिया का 5 फीसदी हिस्सा संबंधित नगरपालिका को मुफ्त में सामुदायिक सुविधाएं के लिए देना होगा। डेवलपर चाहे तो इन सुविधाओं को खुद या किसी तीसरे पक्ष के जरिए विकसित भी कर सकता है, लेकिन इसकी लागत वहां रहने वाले लोगों पर नहीं डाली जा सकती। सरकार ने नई कॉलोनियों में पर्यावरण से जुड़े प्रावधान भी अनिवार्य किए हैं। कुल प्रस्तावित स्ट्रीट लाइट में कम से कम 50 फीसदी सोलर-पावर्ड Street Lights लगाने होंगे।
62 नगरपालिकाएं योजना के दायरे में
सरकार ने फिलहाल 62 नगरपालिकाओं को योजना के दायरे में रखा है। इनमें नारायणगढ़, बराड़ा, रादौर, शाहाबाद, पेहोवा, कैथल, समालखा, गोहाना, भिवानी, चरखी दादरी, नूंह, नारनौल, फतेहाबाद, सिरसा और जींद सहित कई शहर और कस्बे शामिल हैं। इन छोटे शहरों में आने वाले समय में नियोजित आवासीय विकास के लिए जमीन की मांग बढ़ सकती है। हालांकि इसका असर हर शहर में एक जैसा नहीं होगा। स्थानीय रोजगार, सड़क संपर्क, बुनियादी सुविधाएं और आबादी की वृद्धि इसकी दिशा तय करेंगे।
खरीदारों के लिए बढ़ेगी पारदर्शिता
रियल एस्टेट एक्सपर्ट प्रदीप मिश्रा के नजरिए से देखें तो इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने अनियोजित विकास की समस्या का समाधान केवल कार्रवाई के जरिए करने के बजाय वैध और नियोजित प्लॉटेड डेवलपमेंट का रास्ता तैयार किया है। अगर योजना सही तरीके से लागू होती है तो छोटे शहरों में लोगों को अनधिकृत कॉलोनियों के बजाय ऐसी रेजीडेंशियल स्कीम में प्लॉट खरीदने का विकल्प मिल सकता है, जहां सड़क, पानी, सीवर, ड्रेनेज और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी पहले से तय होगी। खरीदारों के नजरिए से RERA रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता भी महत्वपूर्ण है। इससे बिना रजिस्ट्रेशन के प्रोजेक्ट की एडवरटाइजिंग और बुकिंग पर रोक रहेगी और खरीदारों के लिए प्रोजेक्ट की वैधता जांचना आसान हो सकता है।
