मेरठ के बहुचर्चित'नीले ड्रम'कांड से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है। दोनों ने मेरठ की अदालत की ओर से सुनाई गई मौत की सजा को चुनौती देते हुए खुद को सभी आरोपों से बरी करने की मांग की है।
न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की पीठ ने मंगलवार को दोनों की अपील पर सुनवाई के लिए 30 नवंबर की तारीख तय की। मेरठ की अदालत ने सौरभ राजपूत की हत्या और शव को छिपाने के मामले में मुस्कान और साहिल को दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया था।
3 मार्च 2025 को हुई थी सौरभ राजपूत की हत्या
मामला मेरठ के ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र का है। यहां पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी सौरभ राजपूत की तीन मार्च 2025 को हत्या कर दी गई थी। इस मामले में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और मुस्कान के साथी साहिल शुक्ला को आरोपी बनाया गया था।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, हत्या के बाद सौरभ के शव को ठिकाने लगाने के लिए नीले प्लास्टिक के ड्रम में रखा गया। शव को छिपाने के लिए ड्रम में सीमेंट और कंक्रीट भरा गया था। मामला सामने आने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था और यह घटना व्यापक चर्चा का विषय बन गई थी।
126 सुनवाइयों के बाद सुनाई गई थी फांसी की सजा
मामले में मेरठ के जिला न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने 30 सितंबर को दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। इस फैसले तक पहुंचने में अदालत में कुल 126 सुनवाइयां हुईं और मुकदमे की सुनवाई लगभग 13 महीने चली।
अपील में फैसले को बताया अवैध और मनमाना
मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने अपनी अपील में निचली अदालत के फैसले को अवैध और मनमाना बताया है। दोनों ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों से बरी किए जाने की मांग की है। अपील में यह भी दलील दी गई है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अब हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान निचली अदालत के फैसले और दोषियों की ओर से पेश की गई दलीलों पर विचार किया जाएगा।
30 नवंबर को होने वाली सुनवाई इस मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से अहम होगी। हालांकि, अपील दायर होने से निचली अदालत का फैसला अपने आप रद्द नहीं होता। हाईकोर्ट में सुनवाई के बाद ही आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।
