Jairam Ramesh on Election Commission: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को लेकर बड़ा बयान दिया है। जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, चुनाव आयोग ने कल शाम सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है, वह भ्रामक, छलपूर्ण और दोहरी नीयत से भरा है। यह खुद चुनाव आयोग के लिए भी बेहद नुकसानदेह है। उन्होंने 6 बिंदुओं में आयोग पर आरोप लगाए-
1. Form 6 में गैरकानूनी संशोधन:
इस मुद्दे पर ECI ने साफ तौर पर धोखा देने और शब्दों की बाजीगरी करने की कोशिश की है। पहले उसने दावा किया कि Form 6 के साथ जोड़े गए नए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था, जबकि बाद में कोर्ट ने खुद इस दावे का खंडन कर दिया। दूसरा, अब ECI दावा कर रहा है कि नया डिक्लेरेशन फॉर्म अलग है और Form 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया। लेकिन यह भी एक धोखा है क्योंकि इस अनिवार्य डिक्लेरेशन को भरे बिना ऑनलाइन Form 6 जमा ही नहीं किया जा सकता था। तीसरा, ECI का अपना स्टैंड लगातार बदल रहा है। 26 सितंबर 2026 को उसने कहा था कि यह डिक्लेरेशन Form 6 के साथ जोड़ा गया है। अब वह कह रहा है कि यह Form 6 का हिस्सा नहीं है। ECI इस तरह Registration of Electors Rules, 1960 के खुलेआम उल्लंघन पर पर्दा नहीं डाल सकता।
2. CEC के एकतरफा फैसले:
ECI अब यह दावा करके मुद्दे को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है कि SIR से जुड़े प्रमुख आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों ने औपचारिक रूप से मंजूरी दी थी। लेकिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने CEC के आदेशों पर हो रहे गंभीर उल्लंघनों और गैरकानूनी कार्रवाइयों के खिलाफ आधिकारिक रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। यहां तक कि दोनों ECs को इन फैसलों की जानकारी भी नहीं दी गई थी और उन्हें इनके बारे में खबरों से पता चला। यह सर्वसम्मति से फैसले लेना नहीं, बल्कि एकतरफा निर्णय लेने का मामला है।
3. ECINet के जरिए गैरकानूनी केंद्रीकरण:
मतदाता सूचियों पर नियंत्रण को केंद्रीकृत करने और वैधानिक अधिकार रखने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स के फैसलों को दरकिनार करने के लिए ECINet के इस्तेमाल का मुद्दा दोनों ECs ने आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज कराया था। लगभग हर उस राज्य से EROs के फैसलों को पलटे जाने के सबूत सामने आए हैं, जहां SIR हुई है। इनमें गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं।
4. मनमानी करने वाला IT डिवीजन:
दोनों चुनाव आयुक्तों ने बार-बार चिंता जताई थी कि IT डिवीजन का कामकाज अपारदर्शी है, वह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करता है और बिना अनुमति के फैसले लेता है। उन्होंने ECINet और IT डिवीजन के कामकाज को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। इसके बाद से IT डिवीजन में फैली अव्यवस्था को लेकर कई और खुलासे सामने आए हैं। लेकिन न तो उसके कामकाज में कोई बदलाव हुआ है और न ही इन मुद्दों पर कोई कार्रवाई की गई है।
5. SIR की विनाशकारी प्रक्रिया:
SIR प्रक्रिया में कई गैरकानूनी कार्रवाइयां और नियमों के उल्लंघन सामने आए हैं। लगभग हर राज्य में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने के लिए Form 7 का दुरुपयोग किया गया है।
6. खुलासों से इनकार नहीं:
हलफनामे में मीडिया के बड़े हिस्से में लगातार सामने आ रहे खुलासों की सच्चाई से इनकार नहीं किया गया है। यह CEC द्वारा की गई गंभीर गड़बड़ियों और कानूनी उल्लंघनों की एक और पुष्टि है। जयराम रमेश ने कहा कि झूठ बोलने की शुरुआत करते ही इंसान अपने ही बुने जाल में उलझता चला जाता है। और जब लंबे समय तक यही सिलसिला चलता रहता है, तो आखिरकार उसका झूठ किसी न किसी तरीके से सामने आने लगता है।
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निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया एफिडेविट
गौरतलब है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में काउंटर एफिडेविट दाखिल किया है। आयोग ने याचिका के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह पूरी तरह एक न्यूज रिपोर्ट पर आधारित है। आयोग के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने संबंधित खबर में किए गए दावों की पुष्टि के लिए आयोग से तथ्यात्मक स्थिति जानने का प्रयास भी नहीं किया था। कल सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले दाखिल हलफनामे में आयोग ने कहा है कि जवाब दाखिल करने के लिए इस हलफनामे को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों सहित आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है।
आयोग ने याचिका को गलत धारणाओं पर आधारित बताते हुए कहा है कि इसे कानूनन सुनवाई योग्य नहीं माना जाना चाहिए और खारिज किया जाना चाहिए। आयोग ने साफ किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े तीनों आदेश- 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026- आयोग के सर्वसम्मत फैसलों के आधार पर जारी किए गए थे। आयोग ने कहा कि ये आदेश संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत जारी किए गए। आयोग ने हलफनामे में बताया कि किसी फाइल पर विचार के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त या अन्य निर्वाचन आयुक्तों की टिप्पणियां, सवाल, सुझाव अथवा अलग-अलग विचार अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होते। आयोग के अनुसार, किसी प्रस्ताव पर संबंधित अधिकारियों और सदस्यों के विचारों पर विचार करने के बाद सक्षम प्राधिकारी निर्णय लेता है।
