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'मुझे अब भी नहीं मालूम कि मेरे पिता क्या करते हैं', अजीत डोभाल के बेटे शौर्य का बड़ा खुलासा

Ajit Doval News: अजीत डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल ने अपने पिता से जुड़ा बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया है कि बचपन में पता नहीं था, मेरे पिता एक आईपीएस हैं, अब भी नहीं मालूम कि वह क्या करते हैं। उन्होंने बताया कि उनको अपने पिता के खुफिया मिशन के बारे में बहुत बाद में मालूम पड़ा।

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अपने पिता के बारे में ये क्या कह गए अजित डोवल के बेटे शौर्य डोवल।

Shaurya Doval on His Father: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एवं भारत के सबसे विशिष्ट जासूस अजीत डोभाल के बेटे शौर्य अजीत डोभाल ने कहा है कि बचपन में उन्हें कभी नहीं पता चला कि उनके पिता एक आईपीएस हैं और उन्हें लगता था कि वह विदेश सेवा में हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता एवं विचार मंच ‘इंडिया फाउंडेशन’ के संस्थापक शौर्य अजीत डोभाल ने ‘पीटीआई संपादकों’ के साथ बातचीत के दौरान कहा कि उन्हें अपने पिता के गुप्त अभियानों के बारे में अपने जीवन में बहुत बाद में पता चला।

अजीत डोभाल IPS हैं, उनके बेटे को नहीं थी जानकारी

बैंकर से राजनीतिक विचारक बने शौर्य अजीत डोभाल ने एक सवाल के जवाब में कहा, 'बचपन में मुझे यह भी नहीं पता था कि वह एक आईपीएस अधिकारी हैं... मैं बहुत बाद में भारत वापस आया।' शौर्य अजीत डोभाल ने मजाकिया अंदाज में कहा कि एक बार उन्होंने अपने पिता के एक सहकर्मी से पाकिस्तान की आईएसआई की तुलना में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की गतिविधियों के बारे में खबरों की कमी के बारे में पूछा था। जवाब में आईबी के काम की गुप्त प्रकृति पर प्रकाश डाला गया, 'चूंकि आप इसके बारे में कुछ नहीं सुनते हैं, इसलिए हम यह कर पाते हैं।'

ऐसा करने वाले पहले शख्स हैं एनएसए अजीत डोभाल

भारत के सबसे विख्यात जासूसों में से एक माने जाने वाले अजीत डोभाल वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) के रूप में अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं, जिससे वे एक से अधिक कार्यकाल के लिए इस पद पर रहने वाले पहले व्यक्ति बन गए हैं। केरल कैडर के 1968 आईपीएस बैच के सदस्य, अजीत डोभाल भारत के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित पहले पुलिसकर्मी भी हैं। अजीत डोभाल के करियर में कई खुफिया सफलताएं शामिल हैं, जिनमें मिजो नेशनल आर्मी के खिलाफ घुसपैठ अभियान और म्यांमा और चीन से संबंधित महत्वपूर्ण मिशन शामिल हैं।

'आज तक, मुझे नहीं पता कि वह क्या करते हैं'

ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान उनका योगदान महत्वपूर्ण था। उन्होंने ‘इंडियन एयरलाइंस’ उड़ान 814 अपहरण की घटना के दौरान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अपने पिता के गोपनीय करियर पर विचार करते हुए, शौर्य ने कहा, 'मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी....यह स्पष्ट है कि अगर एक ‘सुपर’ जासूस के बच्चों को उसके काम के बारे में पता होगा, तो वह किस तरह का ‘सुपर’ जासूस होगा?' उन्होंने कहा, 'आज तक, मुझे नहीं पता कि वह क्या करते हैं, घर पर काम पर चर्चा करने की कोई संस्कृति नहीं है। लेकिन वह मुझसे हर चीज पूछते हैं और शायद वह जानते हैं कि मैं क्या करता हूं।'

इंडिया फाउंडेशन को लेकर क्या बोले शौर्य अजीत डोभाल?

शौर्य की टिप्पणियों से अजीत डोभाल परिवार के जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा में एक उच्च-स्तरीय करियर को पारिवारिक जीवन के साथ संतुलित करने की जटिलताओं के बारे में जानकारी मिली। भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने पिछले साल अजीत डोभाल की प्रशंसा करते हुए उन्हें 'अंतरराष्ट्रीय खजाना' कहा था। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में अध्ययन करने वाले शौर्य अजीत डोभाल के पास लंदन बिजनेस स्कूल और शिकागो विश्वविद्यालय से संयुक्त एमबीए की डिग्री है। उन्होंने निवेश बैंकिंग की अपनी शानदार नौकरी छोड़ दी और 2009 में इंडिया फाउंडेशन की स्थापना के लिए भारत वापस आ गए।

उन्होंने कहा, 'यह एक ऐसे देश में एक अच्छी शुरुआत थी, जिसमें राजनीतिक ‘थिंक टैंक’ की संस्कृति नहीं थी। व्यावसायिक गतिविधियां ही वह चीज नहीं थीं जो मैं जीवन में चाहता था, इसलिए यह देश के लिए कुछ करने की मेरी छोटी सी कोशिश थी।' इंडिया फाउंडेशन खुद को दूसरे थिंक टैंक से किस तरह अलग करता है, इस बारे में पूछे जाने पर शौर्य अजीत डोभाल ने कहा, 'सबसे पहले, हम खुद को तटस्थ होने का दावा नहीं करते हैं। यह स्पष्ट है कि भारत के बारे में हमारा एक निश्चित दृष्टिकोण है और हम उसी के अनुसार चलते हैं। भारत को अपनी सभ्यतागत बुद्धिमत्ता को अपनी नीति निर्माण में कैसे लाना चाहिए? इस हद तक, हम दूसरे थिंक टैंक से अलग हैं।'

इंडिया फाउंडेशन के सरकार के साथ संबंधों और थिंक टैंक (विचार मंच) के वित्तपोषण मॉडल के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए शौर्य ने कहा, 'हमारा संबंध सरकार से नहीं बल्कि पार्टी (भाजपा) से है और वह भी एक अनौपचारिक संबंध है।' उन्होंने कहा, 'हमारा वित्तपोषण किसी भी थिंक टैंक की तरह है, कभी-कभी हम इसे निजी संगठनों से लेते हैं, कभी-कभी सरकार से समारोह आदि आयोजित करने के लिए और हम शोध रिपोर्ट लिखते हैं... इसलिए कई चीजें हमारे वित्तपोषण में योगदान देती हैं।'

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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