Vaccine Safety: हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट में HPV वैक्सीन को लेकर एक मामला पहुंचा। सुनवाई के दौरान हाफ-बेक्ड वैक्सीन (half baked vaccines) शब्द काफी चर्चा में रहा। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें होने लगीं। कुछ लोगों ने इसे ऐसे पेश किया, जैसे सरकार लोगों को बिना जांची-परखी वैक्सीन लगा रही हो। लेकिन असलियत कुछ और ही है। अगर आपने भी यह खबर पढ़ी है और सोच रहे हैं कि आखिर हाफ-बेक्ड वैक्सीन का मतलब क्या है, क्या HPV वैक्सीन सुरक्षित है और कोर्ट ने आखिर क्या कहा, तो आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।
आखिर पूरा मामला क्या है?
भारत सरकार ने हाल ही में देशभर में 9 से 14 साल की लड़कियों के लिए HPV वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया है। इसका मकसद है कि भविष्य में सर्वाइकल कैंसर यानी बच्चेदानी के मुंह के कैंसर से बचाव किया जा सके। इसी बीच कुछ लोगों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। उनका कहना था कि इस वैक्सीन की सुरक्षा, इसके लंबे समय के असर और कुछ दूसरे पहलुओं पर और जानकारी सामने आनी चाहिए। उन्होंने कोर्ट से इस अभियान पर रोक लगाने की भी मांग की।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने फिलहाल वैक्सीनेशन अभियान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने केंद्र सरकार, ICMR और CDSCO से जवाब जरूर मांगा कि इस वैक्सीन को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने का आधार क्या है और सुरक्षा को लेकर क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। यानी साफ शब्दों में कहें तो कोर्ट ने वैक्सीन को असुरक्षित नहीं बताया, बल्कि सरकार से पूरी जानकारी मांगी है।
हाफ-बेक्ड वैक्सीन का मतलब क्या है?
सबसे पहले एक बात समझ लीजिए कि हाफ-बेक्ड वैक्सीन कोई मेडिकल शब्द नहीं है। डॉ. श्रेय श्रीवास्तव, सीनियर कंसल्टेंट इंटरनल मेडिसिन, शारदा हॉस्पिटल बताते हैं कि यह सिर्फ एक आम बोलचाल का शब्द है। इसका मतलब ऐसी वैक्सीन नहीं है जो सच में आधी बनी हो, बल्कि इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी वैक्सीन या उसके बारे में दी जा रही जानकारी को लेकर यह कहा जाए कि उसका पूरा वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ या पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत में लगाई जा रही HPV वैक्सीन अधूरी या खराब है।
कोई भी वैक्सीन रातों-रात तैयार नहीं होती
कई लोगों को लगता है कि नई वैक्सीन कुछ महीनों में बन जाती है और लोगों को लगा दी जाती है। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। किसी भी वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाने से पहले कई साल तक रिसर्च होती है। पहले लैब में उसकी जांच होती है। फिर इंसानों पर अलग-अलग चरणों में ट्रायल किए जाते हैं। इन ट्रायल्स में यह देखा जाता है कि वैक्सीन सुरक्षित है या नहीं, इससे शरीर पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ रहा और यह बीमारी से बचाने में कितनी कारगर है। जब वैज्ञानिकों को पूरा भरोसा हो जाता है कि वैक्सीन सुरक्षित है, तभी उसे मंजूरी मिलती है। अगर किसी भी स्टेज पर कोई बड़ी समस्या सामने आती है तो वैक्सीन को मंजूरी नहीं दी जाती।
भारत में कौन तय करता है कि वैक्सीन सुरक्षित है
भारत में कोई भी कंपनी अपनी मर्जी से वैक्सीन लोगों को नहीं लगा सकती। सबसे पहले CDSCO नाम की सरकारी संस्था वैक्सीन से जुड़े सारे वैज्ञानिक डेटा की जांच करती है। इसके बाद NTAGI के विशेषज्ञ यह देखते हैं कि इस वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करना सही होगा या नहीं। इन दोनों संस्थाओं की मंजूरी और विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही स्वास्थ्य मंत्रालय कोई फैसला लेता है। यानी वैक्सीन को कई स्तरों पर परखा जाता है।
HPV क्या है और यह वैक्सीन क्यों जरूरी है
HPV यानी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस एक ऐसा वायरस है जो कई लोगों में बिना किसी लक्षण के भी मौजूद हो सकता है। इसके कुछ प्रकार महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का कारण बन सकते हैं। भारत में हर साल हजारों महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर होता है और बड़ी संख्या में इसकी वजह से मौत भी हो जाती है। डॉक्टरों का मानना है कि अगर सही उम्र में HPV वैक्सीन लग जाए तो भविष्य में इस कैंसर का खतरा काफी कम किया जा सकता है। यही वजह है कि सरकार ने इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने का फैसला लिया है।
कोर्ट में दोनों पक्षों ने क्या कहा
याचिका दायर करने वालों का कहना था कि वैक्सीन की सुरक्षा से जुड़े कुछ सवालों के जवाब अभी भी लोगों को मिलने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि साइड इफेक्ट्स की निगरानी और लोगों को पूरी जानकारी देने पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। वहीं सरकार का कहना है कि HPV वैक्सीन को बिना जांचे-परखे मंजूरी नहीं दी गई है। इसे वैज्ञानिक रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया गया है। सरकार ने यह भी बताया कि देशभर में लाखों लड़कियों को यह वैक्सीन दी जा चुकी है और पूरे अभियान की निगरानी की जा रही है।
क्या किसी भी वैक्सीन के साइड इफेक्ट हो सकते हैं
इस सवाल का जवाब है हां, लेकिन ज्यादातर मामलों में ये सामान्य होते हैं। वैक्सीन लगने के बाद हल्का बुखार आना, इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द होना या हल्की सूजन आना सामान्य बात है। गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत कम मामलों में देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि वैक्सीन लगाने के बाद भी सरकार और डॉक्टर लगातार निगरानी करते रहते हैं। अगर कहीं कोई गंभीर समस्या सामने आती है तो उसकी जांच की जाती है।
सोशल मीडिया की हर बात सच नहीं होती
आजकल स्वास्थ्य से जुड़ी गलत जानकारी बहुत तेजी से वायरल होती है। कई लोग बिना किसी वैज्ञानिक सबूत के वीडियो या पोस्ट डाल देते हैं। ऐसे में लोग डर जाते हैं और वैक्सीन लगवाने से भी कतराने लगते हैं। डॉ. श्रेय श्रीवास्तव कहते हैं कि किसी भी वायरल पोस्ट या व्हाट्सऐप मैसेज पर भरोसा करने के बजाय लोगों को अपने डॉक्टर, स्वास्थ्य मंत्रालय, ICMR या WHO जैसी विश्वसनीय संस्थाओं की जानकारी पर भरोसा करना चाहिए। अगर आपके मन में कोई सवाल है तो सोशल मीडिया पर जवाब ढूंढने के बजाय डॉक्टर से बात करना ज्यादा सही रहेगा।
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आखिर लोगों को क्या समझना चाहिए?
दिल्ली हाई कोर्ट ने अभी तक यह नहीं कहा है कि HPV वैक्सीन असुरक्षित है या इसे बंद कर देना चाहिए। कोर्ट सिर्फ यह जानना चाहता है कि सरकार ने इस वैक्सीन को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने से पहले कौन-कौन से वैज्ञानिक आधार और सुरक्षा मानकों का पालन किया।
दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह वैक्सीन सभी जरूरी वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञों की मंजूरी के बाद ही लोगों तक पहुंची है।
इसलिए किसी भी अफवाह पर भरोसा करने के बजाय सही जानकारी लेना जरूरी है। स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी फैसला हमेशा डॉक्टर की सलाह और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही लेना चाहिए।
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सोशल मीडिया की अफवाहों से बचें
हाफ-बेक्ड वैक्सीन शब्द सुनकर घबराने की जरूरत नहीं है। यह कोई मेडिकल टर्म नहीं है और न ही इसका मतलब यह है कि भारत में लगाई जा रही HPV वैक्सीन अधूरी या असुरक्षित है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सिर्फ सरकार से कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं। मामले की सुनवाई अभी जारी है। ऐसे में सोशल मीडिया की अफवाहों से बचें और केवल भरोसेमंद स्रोतों से मिली जानकारी पर ही विश्वास करें। यही आपकी और आपके परिवार की सेहत के लिए सबसे सही कदम होगा।
