Vaccine Safety: वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में अक्सर कई सवाल रहते हैं। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान हाफ-बेक्ड वैक्सीन (Half-Baked Vaccines) शब्द का जिक्र किया, जिसके बाद यह चर्चा का विषय बन गया। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी कोई भी वैक्सीन, जो पूरी वैज्ञानिक जांच और तय प्रक्रिया से न गुजरी हो, उसे लोगों के इस्तेमाल के लिए नहीं लाया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी केंद्र सरकार के HPV (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीनेशन अभियान से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। हालांकि कोर्ट ने इस अभियान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वैक्सीन के मामले में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।
क्या होती हैं हाफ-बेक्ड वैक्सीन
हाफ-बेक्ड वैक्सीन का मतलब ऐसी वैक्सीन से है, जिसे पूरी तरह जांचे-परखे बिना या सभी जरूरी वैज्ञानिक और नियामक प्रक्रियाएं पूरी किए बिना लोगों के लिए उपलब्ध करा दिया जाए। यानी अगर किसी वैक्सीन की सुरक्षा, असर और गुणवत्ता को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत मौजूद नहीं हैं, फिर भी उसे इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी जाए, तो उसे हाफ-बेक्ड कहा जा सकता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक मेडिकल शब्द नहीं है, बल्कि ऐसी वैक्सीन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य वर्णनात्मक शब्द है।
वैक्सीन बनने में कितना समय लगता है
किसी भी वैक्सीन को तैयार करना आसान काम नहीं होता। इसके पीछे कई सालों की रिसर्च और परीक्षण शामिल होते हैं। सबसे पहले वैज्ञानिक लैब में रिसर्च करते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि वायरस या बैक्टीरिया के खिलाफ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कैसे विकसित की जा सकती है। इसके बाद संभावित वैक्सीन का जानवरों पर परीक्षण किया जाता है।
अगर शुरुआती नतीजे अच्छे आते हैं, तब इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू किए जाते हैं। ये ट्रायल भी अलग-अलग चरणों में होते हैं। पहले चरण में वैक्सीन की सुरक्षा देखी जाती है, दूसरे चरण में सही खुराक और इम्यून रिस्पॉन्स की जांच होती है, जबकि तीसरे चरण में हजारों लोगों पर इसका असर और सुरक्षा का मूल्यांकन किया जाता है। इन सभी चरणों में सफल होने के बाद ही नियामक संस्थाएं वैक्सीन को मंजूरी देती हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा
दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वैक्सीनेशन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी वैक्सीन को पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया और तय मानकों का पालन करने के बाद ही लोगों तक पहुंचाया जाए। कोर्ट ने कहा कि हाफ-बेक्ड वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वैक्सीन को लेकर पारदर्शिता, वैज्ञानिक साक्ष्य और स्थापित नियमों का पालन बेहद आवश्यक है।
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HPV वैक्सीनेशन अभियान पर कोर्ट का फैसला
HPV वैक्सीनेशन अभियान को रोकने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों पर भी गौर किया। सरकार ने बताया कि अब तक HPV वैक्सीन की करीब 55 लाख (5.5 मिलियन) डोज दी जा चुकी हैं और उपलब्ध आंकड़ों में किसी बड़े या तत्काल नुकसान का संकेत नहीं मिला है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने वैक्सीनेशन अभियान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि वैक्सीन से जुड़ी निगरानी, सुरक्षा और सभी नियमों का पालन लगातार होना चाहिए।
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लोगों को क्या समझना चाहिए
आज सोशल मीडिया पर वैक्सीन से जुड़ी कई तरह की जानकारी और अफवाहें तेजी से फैलती हैं। ऐसे में किसी भी वैक्सीन के बारे में राय बनाने से पहले केवल वायरल पोस्ट या अपुष्ट दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। किसी भी वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावशीलता का फैसला वैज्ञानिक शोध, क्लीनिकल ट्रायल और संबंधित नियामक संस्थाओं की मंजूरी के आधार पर ही किया जाता है। इसलिए सही और भरोसेमंद जानकारी पर विश्वास करना ही सबसे बेहतर तरीका है।
