Food and Mental Health: चाय के साथ चिप्स का पैकेट, मूवी देखते समय कुछ मीठा या सफर में कोई फ्लेवर्ड ड्रिंक इन चीजों को खाना आजकल आम बात है। स्वाद अच्छा लगता है और कुछ देर के लिए मूड भी बेहतर महसूस हो सकता है। लेकिन अगर ऐसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स हमारी रोज की डाइट का हिस्सा बन जाएं, तो क्या इसका असर मानसिक सेहत (Mental Health) पर भी पड़ सकता है। एक नए अध्ययन ने इसी सवाल को लेकर ध्यान खींचा है। शोध में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले कुछ फ्लेवरिंग, कलरिंग एजेंट और स्वीटनर्स और डिप्रेशन के खतरे के बीच संबंध देखा गया है।
बड़ी संख्या में लोगों के डेटा को किया गया शामिल
इस अध्ययन में करीब 1.71 लाख लोगों के खान-पान और स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों को देखा गया। अध्ययन में शामिल लोग शुरुआत में डिप्रेशन से पीड़ित नहीं थे। शोधकर्ताओं ने कई वर्षों तक उनके स्वास्थ्य और डाइट से जुड़े पैटर्न पर नजर रखी। लगभग 10.7 साल के औसत फॉलो-अप के दौरान 5,424 लोगों में डिप्रेशन के नए मामले सामने आए। इसके बाद शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि इन लोगों के खान-पान और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में मौजूद कुछ खास चीजों के बीच कोई संबंध दिखाई देता है या नहीं।
फ्लेवरिंग को लेकर सामने आया खास कनेक्शन
रिसर्च में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में इस्तेमाल होने वाली फ्लेवरिंग सामग्री पर खास ध्यान दिया गया। ज्यादा फ्लेवरिंग के संपर्क और डिप्रेशन के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध देखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा फ्लेवर एक्सपोजर वाले लोगों में डिप्रेशन का जोखिम सबसे कम एक्सपोजर वाले लोगों की तुलना में 46 प्रतिशत अधिक पाया गया। हालांकि, यहां एक जरूरी बात समझना बहुत जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि फ्लेवर वाली चीज खाने से सीधे डिप्रेशन हो जाएगा।
स्वीटनर्स भी अध्ययन का हिस्सा रहे
आजकल कम चीनी या बिना चीनी वाले कई पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स बाजार में मिलते हैं। इनमें अलग-अलग तरह के कृत्रिम स्वीटनर्स का इस्तेमाल किया जाता है। अध्ययन में कुछ स्वीटनर्स, जिनमें एस्पार्टेम, एसेसुल्फेम और सुक्रालोज शामिल हैं, और डिप्रेशन के खतरे के बीच भी संबंध देखा गया। लेकिन यहां भी इसे कारण और परिणाम के रूप में समझना सही नहीं होगा। किसी व्यक्ति की मानसिक सेहत सिर्फ एक खाद्य सामग्री से तय नहीं होती। उसकी नींद, तनाव, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक जीवन और कई दूसरे स्वास्थ्य संबंधी कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर पैकेज्ड फूड छोड़ दें
रिसर्च पढ़ने के बाद घबराने की जरूरत नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि घर में रखा हर पैकेट तुरंत कूड़ेदान में डाल दिया जाए। असल बात खाने की मात्रा और आदत की है। अगर कभी-कभार चिप्स, बिस्किट या कोई मीठा स्नैक खा लिया तो इसे लेकर डरने की जरूरत नहीं है। समस्या तब हो सकती है जब ऐसे खाद्य पदार्थ रोज के भोजन का बड़ा हिस्सा बन जाएं और फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज जैसी चीजें डाइट से कम होने लगें।
मानसिक सेहत के लिए सिर्फ डाइट पर निर्भर न रहें
अच्छा खान-पान शरीर के साथ-साथ मानसिक सेहत के लिए भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे डिप्रेशन का इलाज नहीं माना जा सकता। अगर किसी व्यक्ति को लगातार उदासी, किसी काम में मन न लगना, नींद या भूख में बदलाव या रोजमर्रा के कामों में परेशानी महसूस हो रही है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। सिर्फ डाइट बदलना पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता का विकल्प नहीं है।
