भारत में दाल, रोटी और चावल लगभग हर घर की थाली का हिस्सा हैं। वैसे जैसे-जैसे देश में डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, कार्बोहाइड्रेट को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा है। क्या इसका मतलब यह है कि भारतीयों को अपनी पारंपरिक डाइट से दूरी बना लेनी चाहिए? जाने-माने कार्डियोवैस्कुलर और थोरैसिक सर्जन डॉ. श्रीराम नेने का मानना है कि समस्या पारंपरिक खान-पान में नहीं, हमारे खाने के तरीके और जीवनशैली में बदलाव में है। डॉ. नेने मानते हैं कि भारतीय अपनी पसंदीदा चीजों को छोड़े बिना स्वस्थ आदतें अपना सकते हैं।
बदलती जीवनशैली और कार्बोहाइड्रेट की भूमिका
डॉ. नेने कहते हैं कि करोड़ों भारतीय प्रीडायबिटिक या टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित हैं। रिसर्च बताती है कि भारतीय डाइट में मिलने वाली कुल ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा कम गुणवत्ता वाले कार्बोहाइड्रेट और रिफाइंड चीनी से आता है।
डॉ. नेने के कहते हैं कि पहले लोग कृषि और शारीरिक श्रम पर आधारित जीवन जीते थे, लेकिन आज हम औद्योगिक युग में हैं जहां डेस्क जॉब और सिडेंट्री लाइफस्टाइल आम हो गई है। शारीरिक गतिविधि कम होने और आसानी से उपलब्ध होने वाले कैलोरी-युक्त भोजन के कारण इसका असर सेहत पर पड़ रहा है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: डॉ. नेने का फिटनेस फार्मूला बदल देगा आपके जीने का अंदाज
संतुलित थाली का सही फॉर्मूला
डॉ. नेने किसी भी सख्त या पाबंदी वाली डाइट के बजाय एक सरल और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते हैं। उनकी प्लेट मॉडल थ्योरी के अनुसार थाली का आधा हिस्सा फाइबर से भरपूर सब्जियों का होना चाहिए। एक चौथाई हिस्से में प्रोटीन शामिल होना चाहिए। बाकी के एक चौथाई हिस्से में बिना रिफाइंड किए गए, कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट होने चाहिए।
इसका मतलब यह है कि आप अपनी सामान्य रोटी या चावल का आनंद ले सकते हैं, बशर्ते मात्रा का ध्यान रखा जाए और उसे पर्याप्त सब्जियों व प्रोटीन के साथ संतुलित किया जाए।
डॉ. नेने खाने के तरीके में बदलाव की बात करते हैं। वो कहते हैं कि वड़ा पाव में आलू के बजाय शकरकंद का इस्तेमाल करके इसे फाइबर-युक्त और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला बनाया जा सकता है। इसी तरह, चीनी की खपत को कम करने के लिए चाय या कॉफी में धीरे-धीरे चीनी डालना बंद करने जैसी छोटी शुरुआत की जा सकती है।
डॉ. नेने जोर देते हैं कि स्वस्थ जीवनशैली रातों-रात नहीं बनती। जरूरत है तो बस सस्टेनेबल आदतें अपनाने की, ताकि हम अपनी संस्कृति और पारंपरिक खान-पान से जुड़े रहते हुए भी एक सेहतमंद और लंबी जिंदगी जी सकें।
