रूस ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता दे दी है। रूस दुनिया का ऐसा करने वाला पहला देश है। अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद जबसे तालिबान ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली है, तब से उसे किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है। तालिबानी सरकार को उस पाकिस्तान ने भी मान्यता नहीं दिया है, जिसने तालिबान को सत्ता में लाने के लिए सहयोग किया था। अब सवाल ये उठता है कि रूस, तालिबान का मान्यता देकर करना क्या चाहता है? तालिबान जिस संगठन से निकला है, उसका गठन ही रूस का विरोध करने के लिए कभी किया गया था। कभी अमेरिका ने रूस को बाहर करने के लिए अफगान मुजाहिदीन का सहयोग किया था। अब पुतिन एक बार फिर से अफगानिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया में रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में हैं।
रूस ने तालिबान सरकार को क्यों दी मान्यता?
रूस को डर है कि अगर अफगानिस्तान अस्थिर रहा, तो आतंकवाद और ड्रग्स तस्करी सेंट्रल एशिया के रास्ते रूस तक फैल सकती है। तालिबान के साथ आधिकारिक संबंध बनाकर रूस प्रत्यक्ष संवाद और नियंत्रण की स्थिति में आना चाहता है। रूस को डर है कि अफगानिस्तान का चरमपंथी प्रभाव चेचन्या, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान जैसे क्षेत्रों में फैल सकता है। तालिबान को मान्यता देकर वह उन पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बना सकता है कि वे रूसी हितों के खिलाफ आतंकियों को संरक्षण न दें। रूस चाहता है कि जब भविष्य में तालिबान को और देशों से मान्यता मिले, तो तालिबान रूस को प्राथमिकता दे, जिससे रूस का प्रभाव अफगानिस्तान में बना रहे।

अफगानिस्तान में सुरक्षा में खड़ा एक तालिबान लड़ाका
वैश्विक लेवल पर रूस की स्थिति मजबूत
रूस तालिबान को मान्यता देकर एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में खुद को पेश करना चाहता है — जो पश्चिमी नीति का विरोध कर सकता है। अफगानिस्तान सेंट्रल एशिया और दक्षिण एशिया के बीच एक रणनीतिक कड़ी है। तालिबान से संबंध मजबूत कर रूस चीन, ईरान और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक नई क्षेत्रीय धुरी (regional axis) बनाना चाहता है। अफगानिस्तान में लिथियम, तांबा, कोयला जैसे खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। तालिबान सरकार के साथ साझेदारी कर रूस वहां खनिजों का दोहन, व्यापार, और ऊर्जा आपूर्ति के रास्ते बना सकता है।
| रूस को फायदा | कहां होगा फायदा |
|---|---|
| रणनीतिक प्रभाव | सेंट्रल एशिया में दबदबा बढ़ाना |
| वैश्विक राजनीति | पश्चिम को चुनौती, राजनयिक बढ़त |
| आर्थिक अवसर | खनिज, व्यापार, हथियार बिक्री |
| आंतरिक सुरक्षा | आतंकवाद पर नियंत्रण के प्रयास |
| क्षेत्रीय साझेदारी | चीन, ईरान, पाकिस्तान से तालमेल |
अफगानिस्तान में एंट्री से रूस को कई फायदे
अफगानिस्तान रूस की "सेंट्रल एशियन बैकयार्ड" के पास है। तालिबान से संबंध मजबूत कर रूस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को संतुलित कर सकता है। वह उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों को यह संदेश दे सकता है कि रूस अब भी एक बड़ा सुरक्षा खिलाड़ी है। चीन, ईरान और पाकिस्तान पहले से तालिबान से संपर्क में हैं। रूस की एंट्री से "एंटी-वेस्ट" गठबंधन मजबूत होगा, जो अफगानिस्तान को अमेरिकी प्रभाव से दूर रखने में सहायक हो सकता है।
कभी रूस के खिलाफ हथियार बना था तालिबान
दिसंबर 1979 में सोवियत संघ (आज का रूस) ने अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट सरकार को बचाने के लिए सैन्य हस्तक्षेप किया। इसके खिलाफ अफगान मुजाहिदीन नाम के लड़ाके खड़े हुए। ये लड़ाके इस्लामिक विचारधारा के थे और सोवियत संघ को "काफिर साम्राज्य" मानते थे। तालिबान उस समय मौजूद नहीं था, लेकिन जिन मुजाहिदीन समूहों ने रूस से लड़ाई लड़ी, उन्हीं से बाद में तालिबान निकला। अमेरिका (CIA) और पाकिस्तान (ISI) ने इन मुजाहिदीन को पैसे, ट्रेनिंग और हथियार दिए।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव (दाएं) और अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी
अफगानिस्तान में रूस की भूमिका
अफगानिस्तान में रूस की भूमिका पिछले चार दशकों में बहुत जटिल, बदलती हुई और रणनीतिक रही है। सोवियत संघ (अब रूस) ने 1979 में अफगानिस्तान पर सैन्य चढ़ाई की थी, और तब से लेकर आज 2025 तक, रूस अफगानिस्तान में कभी दखल देने वाला ताकतवर पड़ोसी, तो कभी राजनयिक साझेदार की भूमिका में रहा है।
- सोवियत संघ (रूस) ने दिसंबर 1979 में अफगानिस्तान पर कब्जा किया ताकि वहां की कम्युनिस्ट सरकार को बचाया जा सके। अफगान मुजाहिदीन (जिसे अमेरिका, पाकिस्तान, सऊदी अरब ने समर्थन दिया) ने सोवियत सेना से लड़ाई लड़ी। यह युद्ध 10 साल तक चला और सोवियत संघ को भारी नुकसान झेलना पड़ा — यह उसकी अंत की शुरुआत मानी जाती है।
- 1989 में सोवियत सेनाएं वापस लौट गईं। इसके बाद तालिबान ने 1996 में काबुल पर कब्जा किया। तब रूस ने कभी भी तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी।
- 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान सरकार गिरा दी। रूस ने अमेरिकी ऑपरेशन का प्रारंभिक समर्थन किया, क्योंकि उसे भी तालिबान और आतंकवाद से खतरा था।
- लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका का प्रभाव बढ़ा, रूस ने अपनी कूटनीति को पुनः सक्रिय किया और धीरे-धीरे अफगान राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने लगा।
- इसके बाद जब तालिबान ने अमेरिका को भगाया और सत्ता में आया तब रूस ने अफगान शांति वार्ताओं के लिए "मॉस्को फॉर्मेट" शुरू किया जिसमें तालिबान, अफगान सरकार, पाकिस्तान, भारत, चीन आदि को आमंत्रित किया गया। रूस ने तालिबान को बातचीत में शामिल किया और धीरे-धीरे संपर्क बढ़ाया। अब रूस ने तालिबान को मान्यता दे एक बड़ी रणनीतिक चाल चल दी है।
भारत के लिए इस फैसले का क्या मतलब?
भारत अफगानिस्तान में पारंपरिक रूप से लोकतांत्रिक ताकतों का समर्थन करता आया है। भारत ने अफगानिस्तान में अरबों डॉलर की सड़कें, बांध, स्कूल और संसद भवन बनाए हैं। तालिबान की सरकार आने के बाद से भी भारत का संबंध अच्छा ही रहा है, लेकिन भारत ने तालिबानी सरकार को मान्यता नहीं दी है। ऐसे में रूस के इस फैसले के बाद भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और सामरिक घटनाक्रम है। यह सिर्फ अफगानिस्तान की राजनीति नहीं, बल्कि भारत की पड़ोसी नीति, सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय प्रभाव पर भी असर डालता है। रूस की मान्यता के बाद चीन, ईरान, पाकिस्तान जैसे देश भी तालिबान से नजदीकी बढ़ा सकते हैं। अगर तालिबान को वैश्विक वैधता मिलती गई, तो भारत को भी अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
