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टैरिफ पर ट्रंप के सुर कभी नरम तो कभी गरम, फैसले पर U-टर्न के पीछे घरेलू-वैश्विक दबाव, अब आगे क्या?

Tarrif War Between US and China: लोगों के आक्रोश और गुस्से को देखते हुए रिपब्लिकन पार्टी को लगा कि अगर ये विरोध-प्रदर्शन और तेज हुआ तो ट्रंप की लोकप्रियता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोनों में तेजी से गिरावट आनी शुरू हो जाएगी। यही नहीं, चीन के अलावा ब्राजील, मैक्सिको, यूरोपीय यूनियन एवं अन्य देश टैरिफ के खिलाफ जिस तरह से लामबंद हो रहे हैं और जवाबी टैरिफ लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं।

Donald Trump

डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर टैरिफ बढ़ाकर 125 प्रतिशत कर दिया है।

Tarrif War Between US and China: अपने टैरिफ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख कभी नरम तो कभी गरम है। दुनिया भर पर टैरिफ की बीछौर करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के सुर एक बार फिर बदल गए हैं। बुधवार को उन्होंने चीन को छोड़कर दुनिया भर के देशों को एक बड़ी राहत दी। उन्होंने अगले 90 दिनों के लिए अपने जवाबी टैरिफ को 90 दिनों के टाल दिया। यानी कि टैरिफ की बढ़ी हुई दर इन देशों पर लागू नहीं होगी लेकिन चीन पर उनके तेवर कड़े हैं। ट्रंप ने चीन पर टैरिफ 104 प्रतिशत से बढ़ाकर 125 प्रतिशत कर दिया। टैरिफ की यह नई दर चीन पर नौ अप्रैल से लागू भी हो गई। चीन पर इतना ज्यादा टैरिफ लगाने पर ट्रंप ने कहा कि चीन ने दुनिया के बाजारों के प्रति असम्मान दिखाया है, इसलिए उस पर टैरिफ लगाया है। बाकी देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगा रहेगा।

चीन ज्यादा उछल रहा था, इसलिए टैरिफ बढ़ाया-ट्रंप

अपने सोशल मीडिया ट्रूथ सोशल पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि 'चीन ने दुनिया के बाजारों के प्रति असम्मान दिखाया है। मैं उस पर 125 प्रतिशत लगा रहा हूं जो कि तत्काल प्रभाव से लागू होने जा रहा है। चीन और अन्य देश जो अमेरिका से कारोबार में जो फायदा उठा रहे थे, मुझे लगता है कि एक दिन उन्हें यह बात महसूस होगी। टैरिफ पर पहले वाली व्यवस्था अब नहीं चल सकती।' उन्होंने कहा कि 'चीन थोड़ा उछल-कूद रहा था। मैंने पहले ही कहा था जो देश जवाबी टैरिफ लगाएगा उस पर वह टैरिफ दोगुना कर देंगे, इसके बावजूद चीन उछल रहा था और जवाबी टैरिफ लगा रहा था।' हालांकि, ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह समझदार व्यक्ति हैं। चीन टैरिफ पर डील करना चाहता है लेकिन उसे पता नहीं है कि वह शुरुआत कहां से करे।

टैरिफ पर रोक की वजह क्या है

टैरिफ को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे ट्रंप का यह ताजा फैसला यू-टर्न जैसा है। पहले टैरिफ बढ़ाया और फिर पीछे हट गए। इसके पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। सबसे बड़ी वजह टैरिफ की घोषणा होते ही दुनिया भर के शेयर बाजारों में जिस तरह से हाहाकार मची और बाजार जिस तरह से धाराशायी हुए उससे अर्थव्यवस्थाओं पर मंदी का खतरा बढ़ने लगा। खुद अमेरिकी शेयर मार्केट औंधे मुंह गिरे और हजारों अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। दूसरा, इस टैरिफ के खिलाफ अमेरिका के कई शहरों में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर आ गए और इसे वापस लेने की मांग की।

सभी के साथ लड़ाई पड़ जाएगी भारी

लोगों के आक्रोश और गुस्से को देखते हुए रिपब्लिकन पार्टी को लगा कि अगर ये विरोध-प्रदर्शन और तेज हुआ तो ट्रंप की लोकप्रियता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोनों में तेजी से गिरावट आनी शुरू हो जाएगी। यही नहीं, चीन के अलावा ब्राजील, मैक्सिको, यूरोपीय यूनियन एवं अन्य देश टैरिफ के खिलाफ जिस तरह से लामबंद हो रहे हैं और जवाबी टैरिफ लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं, उससे दुनिया में नए सिरे से एक ट्रेड वार शुरू हो सकता है। रिपब्लिकन पार्टी को लगता है कि टैरिफ पर एक साथ सभी देशों से लड़ना अमेरिका के हित में नहीं है। देशों की नाराजगी और टैरिफ की लड़ाई का इस्तेमाल चीन अपने फायदे के लिए कर सकता है।

ट्रंप पर घरेलू और वैश्विक दबाव

ऐसे में ट्रंप के इस फैसले पर घरेलू और वैश्विक दबाव दोनों काम कर रहा है। यही नहीं, अमेरिका के वित्त विभाग ने टैरिफ को लेकर चिंता जाहिर की है। ट्रेजरी विभाग के प्रमुख स्कॉट बेसेंस ने कहा कि टैरिफ की वजह से अमेरिका के बॉन्ड मार्केट में गिरावट दर्ज हुई है, अगर यह जारी रहा बॉन्ड मार्केट को भारी नुकसान हो सकता है। इस बीच, टैरिफ बढ़ाने वाले अपने फैसले पर ट्रंप ने कहा कि उनका यह फैसला 'दिल' से लिया गया था। यानी इसका मतलब यह है कि टैरिफ बढ़ाने की अपनी इस योजना पर उन्होंने एक्सपर्ट एवं अपने सहयोगियों के साथ लंबा विचार-विमर्श नहीं किया। वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल की आशंका को देखते हुए ट्रंप ने अपने स्टैंड में नरमी लाना ही सही समझा।

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