Indian Workers Deaths In Gulf: विदेशों में बेहतर भविष्य, उच्च वेतन और परिवार को खुशहाली देने का सपना लेकर खाड़ी देशों का रुख करने वाले भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा पर बड़ा संकट गहराया हुआ है। विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा संसद में साझा किए गए नवीनतम आंकड़ों ने एक भयावह तस्वीर पेश की है। आंकड़ों के अनुसार, खाड़ी देशों में कार्यस्थल पर होने वाले हादसों में औसतन हर हफ्ते तीन भारतीय नागरिक अपनी जान गंवा रहे हैं।
जोखिम और जान के खतरे के बावजूद उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, तेलंगाना और राजस्थान जैसे राज्यों से हर साल लाखों भारतीय खाड़ी देशों की ओर रुख कर रहे हैं।
क्यों हो रही हैं इतनी मौतें?
खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जो वहां के सबसे बड़े प्रवासी समुदाय का हिस्सा हैं। इनमें से अधिकांश ब्लू-कॉलर जॉब्स से जुड़े हैं।
-अधिकतर भारतीय निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर, तेल व गैस, विनिर्माण, परिवहन और रखरखाव जैसे भारी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। यहां ऊंचाइयों पर काम करना और भारी मशीनरी चलाना घातक साबित होता है।
-खाड़ी देशों में गर्मियों के दौरान तापमान 45-50°C तक पहुंच जाता है। हालांकि मिड-डे वर्क बैन लागू है, फिर भी लंबे समय तक बाहर रहने से डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और थकावट से मेडिकल इमरजेंसी बन जाती है।
-सऊदी अरब के नेओम (NEOM) सिटी से लेकर यूएई, कतर और ओमान में चल रही विशाल निर्माण परियोजनाओं के कारण काम का भारी दबाव है।
-बहुराष्ट्रीय कंपनियां तो सुरक्षा नियमों का पालन करती हैं, लेकिन छोटे ठेकेदार और सब-कॉन्ट्रैक्टर अक्सर सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हैं।

हर हफ्ते नौकरी के दौरान होती है तीन भारतीयों की मौत...खाड़ी देशों का सपना पड़ा है महंगा, फिर भी लाखों लोग क्यों भागते हैं इसके पीछे?
जोखिम के बावजूद क्यों खाड़ी देशों का रुख करते हैं भारतीय?
विकल्पों और आर्थिक परिस्थितियों के कारण भारतीय मजदूर इन खतरों को उठाने के लिए मजबूर हैं। प्रवासन की मुख्य वजहें:
-भारत में 20,000 से 30,000 रुपये कमाने वाला व्यक्ति खाड़ी देशों में अर्ध-कुशल काम करके भी दो से तीन गुना अधिक कमाई कर लेता है।
-भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है, जिसमें खाड़ी देशों का बड़ा योगदान है। इस कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर निर्माण और कर्ज से मुक्ति मिलती है।
-विदेश जाने के लिए कई मजदूर भारी ब्याज पर कर्ज लेकर एजेंटों को फीस देते हैं। अनुबंध पूरा किए बिना वापस लौटने पर कर्ज में डूबने का डर उन्हें विषम परिस्थितियों में भी काम करने पर मजबूर करता है।
विदेश में मौत होने पर क्या है कानूनी और मुआवजा प्रक्रिया?
जब किसी भारतीय श्रमिक की विदेश में मृत्यु होती है, तो भारतीय दूतावास और स्थानीय प्रशासन कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करते हैं। भारतीय दूतावास परिजनों को सूचित करने, पोस्टमार्टम और पार्थिव शरीर को भारत भेजने में मदद करता है। पार्थिव शरीर को घर भेजने का खर्च नियोक्ता, बीमा कंपनी या फिर 'इंडियन कम्युनिटी वेलफेयर फंड' (ICWF) द्वारा वहन किया जाता है। वहीं, यदि मृत्यु कार्यस्थल पर दुर्घटना या लापरवाही के कारण हुई है, तो स्थानीय श्रम कानूनों और रोजगार अनुबंध के तहत नियोक्ता मुआवजा देने के लिए बाध्य होता है।
