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पत्नी की गिरफ्तारी पर क्या था प्रेमचंद का रिएक्शन? जिनका जवाहरलाल नेहरू की मां से रहा गहरा नाता

Premchand Story: हिंदी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद को मशहूर कहानियों और प्रचलित रचनाओं के लिए तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि उनकी पत्नी भी किसी से कम नहीं थीं। शिवरानी देवी ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तो और अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

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क्यों गिरफ्तार हुई थीं शिवरानी देवी?

Why Munshi Premchand's Wife Shivrani Devi Arrested: मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) के बारे में तो तमाम कहानियां और किस्से मशहूर हैं, लेकिन क्या आप उनकी पत्नी को जानते हैं? 15 साल की उम्र में ही प्रेमचंद की शादी शिवरानी देवी से हो गई थी। वो साहित्य में निपुण थी, लेकिन अंग्रेजी में उनका हाथ तंग था। जरा सोचिए कि पत्नी को अंग्रेजी समझने में भी परेशानी होती थी और उस वक्त प्रेमचंद अंग्रेजी अखबार 'लीडर' में प्रकाशित हुई खबरों का अनुवाद करते थे। वो गुलामी का दौर था, जब भारत में ब्रिटिश शासनकाल था। भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने अंग्रेजों से खूब लोहा लिया था। वो आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। आपको इस लेख में उस किस्से से रूबरू करवाते हैं, जब शिवरानी को जेल जाना पड़ा था।

आजादी की लड़ाई और प्रेमचंद की पत्नी

मुंशी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी (Shivrani Devi) ने आजादी की लड़ाई में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदुस्तान की दुकानों पर विदेशी सामग्रियों की बिक्री का जमकर विरोध किया था, एक बार धरना देने के चलते उन्हें चेल भी जाना पड़ा था। लेखक और आलोचक वीरेंद्र यादव ने उस किस्से का जिक्र किया है, जब प्रेमचंद की पत्नी को जेल जाना पड़ा था।

Munshi Premchand Marriage Life

मुंशी प्रेमचंद और शिवरानी देवी।

जब शिवरानी देवी को जाना पड़ा था जेल

वीरेंद्र यादव ने इस बात का जिक्र किया था कि करीब साढ़े 6 साल (वर्ष 1924 से 1930 तक) मुंशी प्रेमचंद लखनऊ में अपने परिवार के साथ रहे। इस दौरान प्रेमचंद के साथ उनके दो बेटे, उनकी बेटी और पत्नी शिवरानी देवी भी रहती थीं। आजादी की लड़ाई के दौरान शिवरानी देवी को दो महीने तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा था। दरअसल, 11 नवंबर 1930 को अमीनाबाद के झंडेवाला पार्क में धरना देने की वजह से शिवरानी को गिरफ्तार कर लिया गया था। प्रेमचंद की पत्नी उस वक्त विदेशी सामान की बिक्री कर रहे दुकान के सामने धरना दे रही थीं।

नेहरू की मां को गिरफ्तारी किया तो...

आलोचक और लेखक ने ये भी बताया कि हमेशा ही शिवरानी देवी लोगों के उत्थान की बातें किया करती थीं, साथ ही स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में वो बराबर हिस्सा भी लेती रहती थीं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूप रानी नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने झंडेवाला पार्क में भाषण दिया था।

Munshi Premchand

मुंशी प्रेमचंद।

प्रेमचंद को मालूम नहीं था, क्या कर रहीं पत्नी

उन दिनों आजादी की लगाई में शिवरानी देवी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं, वो इतना लोकप्रिय हो गईं कि महिला वॉलिंटियर की सूची बनाई गई तो कांग्रेस कार्यकर्ता मोहन लाल सक्सेना ने इस ग्रुप का कैप्टन शिवरानी को ही बना दिया। अजब बात तो ये है कि खुद उनके पति मुंशी प्रेमचंद को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनकी पत्नी आजादी की लड़ाई में भाग ले रही हैं। ये तो उन्हें उस वक्त पता चला जब कांग्रेस वॉलिंटियर की लिस्ट को हिंदी और उर्दू में अनुवाद के लिए उनके पास को भेजा गया था। इसी सूची में प्रेमचंद ने शिवरानी देवी का नाम देखा।

पत्नी की गिरफ्तारी पर प्रेमचंद की प्रतिक्रिया

बताया जाता है कि जिस वक्त शिवरानी देवी को गिरफ्तार किया गया था, उस वक्त उनके पति मुंशी प्रेमचंद लखनऊ में नहीं थे, बल्कि वो वाराणसी गए हुए थे। जब उन्हें ये मालूम पड़ा कि उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया है को उन्होंने उस वक्त कहा था, 'तुम नहीं, जेल में मैं हूं। क्योंकि मुझे अपने बच्चों की देखभाल करनी है।' प्रेमचंद के इस रिएक्शन से समझा जा सकता है को वो पत्नी की गिरफ्तारी पर दुखी तो थे, लेकिन उन्होंने ये भी साफ कर दिया था कि ये उनके लिए किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है। यही वजह है कि प्रेमचंद ने खुद ये बात कही थी कि उनकी पत्नी से अपना सम्मान बहुत ऊंचा कर लिया है। दरअसल, प्रेमचंद को लगता था कि वो बनारस पहुंचे हैं तो उन्हें किसी भी वक्त गिरफ्तार किया जा सकता है, लेकिन उनकी पत्नी गिरफ्तार हुईं।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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