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जलप्रलय के बाद क्यों चर्चा में आई कैलाश मानसरोवर यात्रा? जानिए इसका महत्व, रूट और नेपाल का रास्ता चुनने की असली वजह?

Nepal Flash Flood Missing Indian: नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण जलप्रलय में 290 से अधिक भारतीय मानसरोवर यात्री लापता हैं। जानिए कैलाश मानसरोवर यात्रा का धार्मिक महत्व और भारतीय यात्रियों द्वारा नेपाल का रास्ता चुनने की मुख्य वजहें।

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जलप्रलय के बाद क्यों चर्चा में आई कैलाश मानसरोवर यात्रा? जानिए इसका महत्व, रूट और नेपाल का रास्ता चुनने की असली वजह?

Kailash Mansarovar Yatra: नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में आई विनाशकारी अचानक आई बाढ़ (Flash Flood) और मलबे के बहाव ने कैलाश मानसरोवर यात्रा पर एक बार फिर पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। रसुवा और भोटेकोशी/ल्हेन्दे नदी क्षेत्र में तबाही के बाद 290 से अधिक भारतीय नागरिकों सहित सैकड़ों तीर्थयात्री और पर्यटक लापता या फंसे हुए हैं।

इस आपदा के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर कैलाश मानसरोवर यात्रा क्या है, इसका धार्मिक व सामरिक महत्व क्या है, और जब भारत के पास अपने दो आधिकारिक सरकारी रास्ते मौजूद हैं तो भारतीय यात्री नेपाल के रास्ते तिब्बत क्यों जाते हैं?

क्या है कैलाश मानसरोवर यात्रा और इसका महत्व?

कैलाश मानसरोवर यात्रा तिब्बत (चीन) स्थित पवित्र कैलाश पर्वत (6,638 मीटर) और मानसरोवर झील की एक अत्यंत कठिन और पवित्र तीर्थयात्रा है।

धार्मिक आस्था: हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत को भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। मानसरोवर झील को भी परम पवित्र माना गया है। इसके अलावा, बौद्ध, जैन परंपराओं में भी इस स्थान का अत्यंत उच्च धार्मिक महत्व है।

परिक्रमा का महत्व: श्रद्धालु कैलाश पर्वत की पैदल परिक्रमा करते हैं। यह यात्रा अत्यधिक दुर्गम क्षेत्रों से होकर गुजरती है जहां श्रद्धालुओं को 5,630 मीटर ऊंचे डोल्मा ला दर्रे (Dolma La Pass) को पार करना पड़ता है।

सांस्कृतिक व सामरिक कड़ी: यह यात्रा प्राचीन काल से भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत को जोड़ती रही है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इसे निलंबित कर दिया गया था, जिसे 1981 में फिर से शुरू किया गया। यह दोनों देशों के बीच जनता से जनता के संपर्क का एक बड़ा माध्यम है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के 3 मुख्य रास्ते

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा दो आधिकारिक रास्ते संचालित किए जाते हैं, जबकि तीसरा रास्ता नेपाल के निजी ऑपरेटरों का है:

लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड): यह भारत का पारंपरिक सरकारी मार्ग है। श्रद्धालु दिल्ली से कुमाऊं, धारचूला, गुंजी और लिपुलेख दर्रे (5,200 मीटर) होते हुए तिब्बत में प्रवेश करते हैं। इसमें पैदल ट्रेकिंग अधिक होती है और यात्रा में लगभग 22 दिन लगते हैं।

नाथू ला दर्रा (सिक्किम): यह दूसरा सरकारी मार्ग है, जहां गंगटोक और नाथू ला होकर गाड़ियों से यात्रा पूरी की जाती है। इसमें पैदल चलना कम पड़ता है और यह बुजुर्गों के लिए अनुकूल माना जाता है। इसमें लगभग 21 दिन लगते हैं।

नेपाल का रास्ता (निजी मार्ग): काठमांडू से शुरू होकर यह सड़क मार्ग ट्रिशुली, धुंचे, स्याफ्रुबेसी, रसुवा/रसुवागढ़ी, और तिब्बत के जिरोंग (Gyirong/Kerung) होकर मानसरोवर पहुंचता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा और इसका महत्व

कैलाश मानसरोवर यात्रा और इसका महत्व

सरकारी रास्ते होते हुए भी भारतीय यात्री नेपाल का रूट क्यों चुनते हैं?

नेपाल का मार्ग आधिकारिक (सरकारी) नहीं है, फिर भी हजारों भारतीय इसे चुनते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

विदेश मंत्रालय (MEA) की लॉटरी व्यवस्था से छूट: भारत सरकार के दोनों रूटों पर सीटों की संख्या सीमित होती है और यात्रियों का चयन लॉटरी प्रणाली और सख्त मेडिकल टेस्ट के आधार पर होता है। निजी ऑपरेटरों के जरिए नेपाल रूट चुनने पर लॉटरी का इंतजार नहीं करना पड़ता।

लचीलापन और सुविधाएं: नेपाल रूट पर निजी ऑपरेटर यात्रियों की सुविधा के अनुसार कार, बस और हेलीकॉप्टर तक के विकल्प (जैसे नेपालगंज-सिमिकोट-हिल्सा रूट) प्रदान करते हैं।

कम समय: नेपाल के रास्ते यात्रा 10 से 14 दिनों में पूरी हो जाती है, जो सरकारी रूट (21-22 दिन) की तुलना में काफी छोटी है।

एनआरआई (NRI) और विदेशी नागरिकों के लिए एकमात्र जरिया: भारत सरकार की यात्रा केवल भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए होती है, इसलिए प्रवासी भारतीय (NRI) नेपाल के रास्ते ही तिब्बत जाते हैं।

नेपाल रूट पर कैसे आई तबाही और यात्री क्यों फंसे?

बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी और भोटेकोशी नदी घाटी में भीषण त्रासदी आई।

ग्लेशियर टूटने से जलप्रलय: अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, ग्लेशियर के बर्फ और मलबे के अचानक ढहने से भोटेकोशी नदी में विशालकाय सैलाब आया।

अचानक कटाव: इस अचानक आई बाढ़ और मलबे ने कुछ ही मिनटों में सड़कें, पुल, होटल और संचार नेटवर्क पूरी तरह नष्ट कर दिए।

मानसून का जोखिम: कैलाश यात्रा का मौसम गर्मियों (जून से सितंबर) में होता है, लेकिन यही समय हिमालयी क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून का भी होता है, जिससे भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

सड़कें और बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह होने के कारण बचाव दल और हेलीकॉप्टरों को फंसे हुए 290 से अधिक भारतीयों तक पहुंचने में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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