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चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस ने छोड़ा NDA का साथ; तो क्या बिहार चुनाव से पहले जाएंगे INDIA के साथ?

Bihar Politics: अब पशुपति पारस का अगला ठिकाना कहां होगा? उन्होंने खुद ये ऐलान कर दिया है कि वो भाजपा के नेतृत्व वाले NDA से अलग होने जा रहे हैं। तो क्या अब रामविलास पासवान के भाई और चिराग पासवान के चाचा INDI गठबंधन में शामिल हो सकते हैं? ऐसा इसलिए, क्योंकि अब चिराग के चाचा के पास कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा।

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पशुपति पारस अब क्या करेंगे?

लोकसभा चुनाव में ही चिराग पासवान ने अपने चाचा पशुपति पारस से हिसाब बराबर कर लिया, यानी चिराग ने अपने चाचा से बदला ले लिया, लेकिन सवाल ये खड़ा हो रहा था कि अब चाचा का क्या होगा? पशुपति पारस ने जब अपने भतीजे को गच्चा देकर पार्टी पर कब्जा कर लिया था, उस वक्त तो उन्हें केंद्रीय मंत्री की कुर्सी मिल गई थी। हालांकि अब बिहार में चुनाव है, ऐसे में चाचा को इस बात का पूरा अंदाजा था कि जिस तरह उन्हें लोकसभा चुनाव में भाजपा नीत एनडीए में किसी ने नहीं पूछा, वही हाल इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी होना है। ऐसे में अब पशुपति पारस ने अपनी राह बदलने का ऐलान कर दिया है यानी चिराग के चाचा अब एनडीए से अलग हो रहे हैं।

पशुपति पारस ने छोड़ा एनडीए का साथ

RLJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष पशुपति पारस ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि आज से उनकी पार्टी NDA से हम अलग हो रही है। अब NDA से उनका कोई रिश्ता नहीं रहेगा। उन्होंने आगे कहा कि वो बिहार की सभी 243 विधानसभा सीट पर घूमेंगे, जब समय आयेगा तो आगे बताया जाएगा। बिहार सरकार दलित विरोधी सरकार है।

क्या अब INDIA में शामिल होंगे पशुपति पारस?

बिहार की सियासत में नया उबाल आ चुका है। बीते साल हुए लोकसभा चुनाव में चिराग पासवान vs पशुपति पारस की लड़ाई में फिलहाल भतीजे ने अपने चाचा को चारो खाने चित कर दिया था। इस वक्त पशुपति पर एक कहावत सटीक बैठेगी- खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे...। पशुपति पारस को 'माया मिली न राम...' लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उनके साथ खेला करते हुए राज्य की 5 सीटें भतीजे चिराग के खाते में दे दी थी।

Chirag Paswan vs Pashupati Paras

पशुपति पारस vs चिराग पासवान।

उसी वक्त इसका मतलब साफ हो गया था कि, इस चाचा-भतीजे की लड़ाई में भतीजे ने बाजी मार ली। अब चाचा के पास क्या ही चारा था, वही हुआ जिसके आसार लगाए जा रहे थे। पशुपति पारस ने आखिरकार बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और एनडीए से नाता तोड़ लिया।

क्या अब लालू के भरोसे चलेगी पशुपति की गाड़ी?

माना जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व वाले NDA से अलग होने के बाद रामविलास पासवान के भाई और चिराग पासवान के चाचा INDI गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। वैसे भी बिहार में NDA के लिए पिछली बार जैसा समीकरण बन गया है। यदि ये कहें कि ये पिछली बार की तुलना में और भी मजबूत है तो गलत नहीं होगा। हालांकि लालू यादव कतई नहीं चाहेंगे कि पिछले विधानसभा चुनाव 2020 की तरह इस बार भी उनकी आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी सरकार न बना पाए। ऐसे में लालू यादव निश्चित तौर पर पशुपति पारस को अपने खेमे में खींचने का प्रयास करेंगे।

बिहार में जब चाचा ने भतीजे को दिया था गच्चा

वो कहते हैं न जैसे को तैसा... राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। एक ऐसा भी वक्त आया था, जब चाचा ने भतीजे को कहीं का नहीं छोड़ा था। पशुपति पारस ने चिराग लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए ऐसा खेला किया था जिसका उन्हें अंदाजा तक नहीं था। उन्होंने LJP के 6 में से 5 सांसदों को तोड़ लिया था। और इसके बार चिराग अकेले रह गए। हाजीपुर के सांसद पशुपति पारस के साथ वैशाली से सांसद वीणा देवी, खगड़िया से सांसद चौधरी महबूब अली कैसर, नवादा से चंदन सिंह, समस्तीपुर से प्रिंस राज को तोड़ लिया था।

Chirag Paswan

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान

हालांकि बीते लोकसभा चुनाव 2024 में सारा खेल उलटा पड़ गया। भाजपा ने पशुपति पारस के खेमे को एक भी सीट नहीं दी थी। चिराग की पार्टी ने सभी 5 सीटों पर जीत हासिल की और चिराग पासवान केंद्र सरकार में मंत्री बन गए। अब चिराग पासवान अपने चाचा पर शायद कभी भरोसा न कर पाएं, क्योंकि एक कहावत है- 'Once a cheater, always a cheater', मतलब जो एक बार धोखा दे सकता है वो हमेशा धोखेबाज ही होगा।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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