US Iran War: बीते 28 फरवरी को जब ईरान पर अमेरिका और इजराइल का हमला हुआ तो ईरान ने भी बिना देरी किए पलटवार करना शुरू किया। इजराइल से लेकर सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, कतर और ओमान में मिसाइलों और ड्रोन से हमले करने शुरू किए। खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य बेसों को तो उसने निशाना बनाया ही। सऊदी अरब, यूएई, कतर के ऊर्जा संयंत्रों, होटलों और एयरपोर्ट पर हमले किए। यानी अपने हमलों में उसने नागरिक ठिकानों को भी नहीं बख्शा। इन हमलों में इन देशों को काफी नुकसान पहुंचा लेकिन सीजफायर टूटने और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान जिस तरह से जवाब दे रहा है, उससे पलटवार की उसकी रणनीति बदली हुई लग रही है। ईरान हमले तो जरूर कर रहा है लेकिन थोड़ी बदली हुई रणनीति के साथ। इस बार भी वह खाड़ी के देशों को निशाना बना रहा है लेकिन इस बार उसने सऊदी अरब, यूएई और कतर को निशाना नहीं बनाया जैसा कि उसने मार्च और अप्रैल महीने में किया। इस बार उसके हमले बहरीन, कुवैत और जॉर्डन पर ज्यादा हुए हैं।
युद्ध का नया मोर्चा खोल सकता है सऊदी अरब से सीधा टकराव
खाड़ी के इन तीनों देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं। हमलों में ईरान ने इन्हीं अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है और अमेरिकी हथियारों को नुकसान पहुंचाने का दावा किया है। हो सकता है कि इस बार इन्हीं सैन्य ठिकानों से ईरान पर हमले हो रहे हैं और इसके जवाब में तेहरान जवाबी कार्रवाई कर रहा हो। या ये भी हो सकता है कि हमले को लेकर इन देशों की ईरान के साथ कोई 'गुप्त' बातचीत हुई है। ये भी हो सकता है कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने तय किया हो कि एक साथ युद्ध के कई मोर्चे खोल देना ठीक नहीं। खासकर, सऊदी अरब से सीधा टकराव उसे क्षेत्रीय युद्ध में खींच सकता है। सऊदी अरब पर हमले पाकिस्तान को भी इस युद्ध में घसीट सकते हैं। पाकिस्तान यदि इस युद्ध में कूदा तो जंग का दायरा दूसरी तरफ जा सकता है। ईरान की करीब 900 किलोमीटर पूर्वी सीमा पाकिस्तान के साथ लगती है।
बीते एक सप्ताह में ईरान में इन जगहों पर हुए हमले
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक सप्ताह में अमेरिकी CENTCOM ने ईरान तटवर्ती इलाकों के साथ-साथ उसके अंदरूनी इलाकों में भी हमले किए हैं। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इन हमलों में कम से कम 35 लोगों की जान गई है और करीब 300 लोग घायल हुए हैं। ईरानी मीडिया के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में देश के दक्षिणी तटीय इलाकों, द्वीपों और मुख्य भूमि के कई शहरों में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। ये हमले अक्काला, अहवाज, बंपुर, बंदर अब्बास, बुशेहर, चाबहार , चाबहार बंदरगाह, दश्त-ए-अजादेगान, देहलोरान, फरवर द्वीप, हाजीआबाद, होवेजेह, ईरानशहर हवाई अड्डा, इस्फहान, जास्क, कबूदारआहंग, खोंदाब, कोनारक, बंदर-ए-महशहर, केश्म द्वीप, सीरिक और वेसियान में हुए।
strait of hormuz
तो इसलिए ईरान के तटवर्ती इलाकों में हमले?
ईरान का दक्षिणी इलाके का बड़ा भू-भाग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लगता है और इसी इलाके में ईरान के करीब 30 द्वीप हैं और इनमें से कई उसके लिए एक रक्षात्मक ढाल भी बनाते हैं। इन द्वीपों के जरिए ईरान होर्मुज में आने-जाने वाले जहाजों पर नजर रखता है और यहां पर उसकी मिसाइलें, ड्रोन और नौसेना तैनात हैं। ईरान के तटवर्ती इलाकों में हमला करने का अमेरिका का एक मकसद यह भी है कि वह आईआरजीसी की निगरानी एवं हमले की क्षमता कमजोर करना चाहता है। तटवर्ती इलाकों में ईरान का सैन्य सामर्थ्य कमजोर होना जहाजों की आवाजाही के लिए होर्मुज को ज्यादा सुरक्षित बनाएगा। तटवर्ती इलाकों में ईरान यदि कमजोर पड़ता है तो अमेरिकी युद्धपोत, जहाज और अन्य समुद्री विमान ज्यादा सुरक्षित होकर होर्मुज क्षेत्र में दाखिल हो सकेंगे।
युद्ध से पहले 100 जहाज होर्मुज से गुजरते थे
अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को शुरू किए गए युद्ध से पहले, हर दिन लगभग 100 जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते थे। इनमें करीब आधे तेल टैंकर होते थे, जो प्रतिदिन 2 करोड़ (20 मिलियन) बैरल कच्चा तेल ले जाते थे। यह दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग 20% है। 17 जून को अमेरिका-ईरान के प्रारंभिक समझौते के बाद इस जलमार्ग को फिर से खोल दिया गया, लेकिन जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर तक नहीं पहुंची। पोर्टवाच के आंकड़ों के अनुसार, 18 जून से 12 जुलाई के बीच, यानी जलमार्ग खुलने के बाद के पहले 25 दिनों में, केवल 603 जहाज यहां से गुजरे। यह औसतन 24 जहाज प्रतिदिन है, जो युद्ध-पूर्व औसत से काफी कम है। 6-7 जून को जहाजों पर हुए हमलों के बाद से इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या लगातार घटी है। अब ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी के कारण आशंका जताई जा रही है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर लगभग ठप हो सकता है।
मध्य पूर्व में तीन प्रमुख समुद्री रास्ते
मध्य पूर्व में तीन समुद्री रास्ते हैं जिनसे होकर समुद्री व्यापार होता है। इनमें बाब अल-मंदेब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जो लाल सागर और स्वेज नहर को हिंद महासागर से जोड़ता है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि संघर्ष और बढ़ता है, या अमेरिका उसके ऊर्जा संयंत्रों पर यदि हमले करता है तो यमन के हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब जलमार्ग को अपने हमलों से बंद कर सकते हैं। ईरान यमन के हूतियों को वित्तीय, हथियार एवं वैचारिक रूप से मदद करता आया है। रिपोर्टों के मुताबिक हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन हैं जिनसे वे लाल सागर में हमला कर बाब अल मंदेब के समुद्री रास्ते को अवरुद्ध कर सकते हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब दोनों बंद हो जाते हैं, तो दुनिया की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। होर्मुज के अवरुद्ध हो जाने के बाद सऊदी अरब करीब 70 प्रतिशत अपना तेल लाल सागर से भेज रहा था। खासतौर से एशिया और यूरोप जाने वाला उसका तेल इसी मार्ग से गुजरता है। बाब अल-मंदेब के बाधित होने पर एशिया और यूरोप जाने वाले निर्यात का बड़ा हिस्सा बाधित हो जाएगा।
iran
प्रमुख समुद्री मार्गों का वैश्विक महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य
वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का 27%
वैश्विक LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) व्यापार का 20%
बाब अल-मंदेब
वैश्विक समुद्री व्यापार का 11%
वैश्विक LNG व्यापार का 8%
स्वेज नहर
वैश्विक समुद्री व्यापार का 11%
वैश्विक LNG व्यापार का 8%
न्यूक्लियर से ज्यादा ताकतवर हैं ये समुद्री रास्ते
अमेरिका ने अपने ताजा हमलों ईरान के तटवर्ती इलाकों में मौजूद रणनीतिक एवं व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण पुलों को निशाना बनाया है। ये पुल कई क्षेत्रों को आपस में जोड़ते हैं। मार्ग अवरुद्ध हो जाने पर तटवर्ती इलाकों में आईआरजीसी तक रसद एवं हथियार पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा। दूसरा, अमेरिका की मंशा ईरान के ऊर्जा संयंत्रों को नुकसान पहुंचाने की हो सकता है जैसा कि ट्रंप घोषणा कर चुके हैं। ईरान की असली ताकत उसका तेल है। इसी तेल के पैसे से वह अपना सारा कामकाज चलाता है। तेल पर यदि संकट आ जाता है तो आगे उसे युद्ध लड़ना काफी मुश्किल हो जाएगा। यह बात उसे पता है इसलिए उसने हूतियों को तैयार करने के लिए कहा है। समुद्र से गुजरने वाला दुनिया का करीब 32 प्रतिशत तेल की आपूर्ति यदि बंद हो जाएगी तो दुनिया में और हाहाकार मच जाएगी। इन दोनों समुद्री मार्गों को बंद कर ईरान पूरे विश्व को हिला देगा। ऐसी ताकत किसी न्यूक्लियर बम में भी नहीं है।
