The VVAAN Review: फिल्म द वन छठी मैया और वन देवी का दिलचस्प कॉन्सेप्ट पर्दे पर लाती है, जो दर्शकों को समझाता है कि विकास के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ जरूरी नहीं है। प्रकृति और विकास एक साथ भी रह सकते हैं अगर इंसान लालच को छोड़ दे।
The VVAAN Review: धर्म में भरोसा जगाने आए सिद्धार्थ-तमन्ना
The VVAAN Review: बचपन में जब घर पर पूजा होती थी तब मम्मी कहती थी, "ना चलो हाथ जोड़कर आंखें बंद करो और भगवान को याद करो।" असल में वो हमें डांटकर सवाल पूछने से नहीं रोकती थीं, वो हमें उस प्यार भरी डांट में ये बताती थी कि समय के साथ सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे लेकिन उन सवालों को समझने के लिए जो संयम चाहिए वो ध्यान से ही मिलेगा। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' भी मां की उस डांट की तरह ही है, जिसमें हमें लॉजिक नजर नहीं आएगा लेकिन कुछ डांटें तो जरूरी होती हैं ना ताकि हमें अच्छा करने की प्रेरणा मिले।
फिल्म 'द वन' की शुरुआत मुंबई में रहने वाले एक कपल ऋषि और ममता (सिद्धार्थ-तमन्ना) से होती है, जो 6 साल पहले अपना बच्चा खो चुका है। इनकी जिंदगी में वो सबकुछ है, जिसकी एक इंसान चाहत करता है लेकिन ये सब बच्चे की किलकारियों के बिना अधूरा है। जगह-जगह डॉक्टरों के पास जाने के बाद भी इन्हें बच्चा नहीं हो है और आईवीएफ के पैसे इनके पास हैं नहीं। इसी बीच इनके हाथ में एक गोल्डन चांस आता है कि ये अपने गांव जाकर पुश्तैनी जमीन बेच आएं और आईवीएफ से अपना परिवार पूरा कर लें। ऐसा करने से पिछड़े हुए गांव से इनका पिंड छूट भी जाएगा। हालांकि इनके सामने एक परेशानी है कि इनकी जमीन उस वन में है, जहां 7वीं सदी में वन देवी को बसाया गया था। वन देवी सालों से कुछ शैतानों को वन में कैद किए हुए है और आम जनों की रक्षा कर रही है। क्या ऋषि ने जो प्लान बनाया है, उसमें वो सफल हो पाएगा या फिर कोख में ही बच्चा मर जाने के बावजूद भी ममता की वन देवी में आस्था कुछ चमत्कार दिखाएगी? इन सभी सवालों के जवाब आपको थिएटर में ही मिलेंगे। TimesNow NavBharat पर ये खबर भी पढ़ें: The Vvaan Box office Day 1: सिद्धार्थ-तमन्ना की जोड़ी मचाएगी धमाल, इतने करोड़ को लेगी ओपनिंग
फिल्म 'द वन' में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि और तमन्ना भाटिया ने ममता का रोल प्ले किया है। मुंबई में रहने वाले इस मॉर्डन कपल की जड़ें सैकड़ों किलोमीटर दूर इनके गांव में हैं, जो स्क्रीन को देखकर महसूस भी होती हैं। तमन्ना भाटिया के पास यूं तो बहुत ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं है लेकिन फिर भी वो प्रभावित करती हैं। जहां तक बात सिद्धार्थ मल्होत्रा की है तो वो लगातार एक एक्टर के तौर पर लगातार निखर रहे हैं और द वन में भी वो पहले से पॉलिश्ड नजर आते हैं। ऋषि का रोल मल्टीलेयर्ड है और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने इसे ठीक से प्ले किया है। मूवी के दौरान कई बार ऐसे मौके आए जब सिद्धार्थ ओवर-द-टॉप जा सकते थे लेकिन उन्होंने कंट्रोल्ड तरीके से सीन्स को परफॉर्म किया है।
मनीष पॉल के हिस्से कुछ-कुछ कॉमेडी सीन्स आए हैं और वो स्क्रीन को लाइट-अप करते हैं। अनूप सोनी ने सिद्धार्थ के बड़े भाई का रोल निभाया है, जिसमें कुछ खास गहरायी नहीं है। अनूप जैसे एक्टर के लिए ये रोल मुश्किल नहीं था। श्वेता तिवारी अनूप सनी की पत्नी बनी हैं, जिसे अपने देवर से परेशानी है। भले ही श्वेता के हिस्से में बेहद छोटा रोल आया हो लेकिन उन्होंने इसमें जान भर दी है। घर में लड़ने वाली भाभी के रोल में वो एकदम फिट हैं, जिसके अपने रीजन्स हैं। TimesNow NavBharat पर ये खबर भी पढ़ें: The Vvaan X Review: सिद्धार्थ-तमन्ना की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट को मिला मिक्स रिएक्शन, किसी ने बताया शानदार तो किसी ने किया ट्रोल
अंत में बात करते हैं सुनील ग्रोवर की, जिन्हें विलेन के रोल में देखना बेहद दिलचस्प रहा। सुनील ग्रोवर ने पर्दे पर एक लालची नेता का रोल बड़ी ही खूबसूरती से निभाया है। सुनील को स्क्रीन पर देखकर हमें गली-मोहल्ले के उस नेता की याद जरूर आएगी, जो अपने फायदे के लिए जनता को भड़काने का काम करता है। उम्मीद है कि बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक 'द वन' देखने के बाद सुनील ग्रोवर के हुनर को और सम्मान देंगे और उनके खाते में इस तरह के ज्यादा रोल आएंगे।
फिल्म 'द वन' का डायरेक्शन दीपक कुमार मिश्रा और अरुणाभ कुमार ने किया है। TVF के अंतर्गत कई कमाल के शोज और कहानियां देने वाले दीपक और अरुणाभ ने 'द वन' में काफी कुछ एक साथ डालने की कोशिश की है, जिसकी वजह से मामला थोड़ा गड़बड़ाता है। हल्की शुरुआत को रोचक कहानी कहीं ना कहीं ढक देती है लेकिन लगातार हिचकोले खाता स्क्रीनप्ले कई बार मजा किरकिरा करता है। वन देवी और छठी मैया की माया को मिक्स करके दीपक-अरुणाभ ने अच्छा कॉन्सेप्ट बनाया था, जिसके खाते में बेहतर सीन्स आने चाहिए थे।
अब आते हैं आखिरी फैसले पर कि 'द वन' देखनी चाहिए या नहीं? तो देखिए अगर आपको मनमोहन देसाई की वो 70s और 80s वाली फिल्में पसंद हैं, जिनको देखते हुए आपका दिमाग सवाल नहीं पूछता है और आपको सलीम-जावेद की फिल्मों के वो सीन्स कमाल के लगते हैं जिनमें बंदूक से चली गोली 768 के बिल्ले से टकराकर रास्ता बदल लेती है तो 'द वन' आपके लिए है। ये फिल्म धर्म में भरोसा जगाती है और हमें समझाती है कि विकास का रास्ता प्रकृति को बर्बाद किए बिना भी बनाया जा सकता है। इस वक्त हमारे देश को ये समझने की बहुत जरूरत है कि असली विकास क्या है और ऐसे वक्त में 'द वन' जरूरी मूवी बन जाती हैं। 'द वन' को बच्चे और टियर 2 सिटीज के दर्शक ज्यादा एन्जॉय करेंगे क्योंकि वो सामाजिक रस्मों से ज्यादा क्लोज हैं। हम अपनी ओर से 'द वन' को 3.5 स्टार देते हैं।