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Maharashtra Election: विकास के मुद्दे या 'बंटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारे? चुनावी अभियान में किसका अधिक बोलबाला; समझिए सबकुछ

Slogans in Maharashtra Election: महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? सूबे में किस पार्टी को प्रचंड बहुमत हासिल होगी? ऐसे विकास के मुद्दों से शुरू हुआ प्रचार अभियान ‘बंटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारों के साथ बढ़ रहा है। आपको इस विधानसभा चुनाव के बदलते मुद्दों को तफसील से समझना चाहिए।

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कितना बदलता चला गया महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का प्रचार अभियान?

Maharashtra Assembly Election: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान अपने चरम पर है। प्रचार अभियान कल्याणकारी पहलों और विकास जैसे मुद्दों के साथ शुरू हुआ था लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढ़ा तो राजनीतिक रैलियों तथा सभाओं में ‘वोट जिहाद’, ‘धर्म युद्ध’, ‘संविधान खतरे में’ जैसे नारे लगने लगे। प्रचार अभियान सोमवार को समाप्त हो जाएगा। प्रचार अभियान के आखिरी दौर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) प्रमुख शरद पवार ने अजित पवार और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे द्वारा किए गए 'विश्वासघात' का हवाला देते हुए मतदाताओं से भावनात्मक अपील की।

विकास के मुद्दों से शुरू हुआ था महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार

मुख्यमंत्री शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), अजित पावर की रांकापा के गठबंधन वाली महायुति सरकार चुनावों से पहले महिलाओं के लिए अपनी ‘लाडकी बहिन योजना’ के सहारे मतदाताओं को साधने में लगी है। विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 20 नवंबर को होना है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली पूर्ववर्ती महा विकास आघाडी (एमवीए) सरकार ढाई साल तक सत्ता में रही, लेकिन जून 2022 में शिंदे और अन्य नेताओं ने बगावत कर दी और इसे गिरा दिया गया। पिछले साल, अजित पवार ने भी कई राकांपा विधायकों के साथ पार्टी में बगावत कर दी थी और महायुति सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए थे।

एक दूसरे पर वार-पलटवार का दौर होने लगा तेज

निर्वाचन आयोग ने शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट असली राकांपा घोषित कर दिया। राकांपा (एसपी) और शिवसेना (यूबीटी) के प्रचार अभियान में शिंदे और अजित पवार द्वारा किया गया 'विश्वासघात' का मुद्दा हावी रहा और ठाकरे ने मतदाताओं से 'गद्दारों' को पराजित करने की अपील की। शरद पवार (84) भी राज्य के दौरे पर हैं और एक समय में अपने विश्वासपात्र रहे छगन भुजबल और दिलीप वलसे पाटिल के गढ़ में रैलियों को संबोधित कर रहे हैं।

शरद पवार सोमवार को अपने गृह नगर बारामती में एक रैली को संबोधित कर सकते हैं, जहां अजित पवार अपने भतीजे एवं राकांपा (एसपी) के युवा नेता युगेंद्र पवार के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। मुंबई के दादर से भाजपा के समर्थक विनोद सालुंके ने दावा किया, 'भाजपा द्वारा अजित पवार को सरकार में शामिल करना पार्टी के मूलभूत मूल्यों के साथ विश्वासघात है। यह भाजपा ही थी जिसने अजित पवार को भ्रष्ट कहा था और उनके खिलाफ अभियान छेड़ा था।' हालांकि, सालुंके ने कहा कि वह फिर भी भाजपा का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उनके पास 'कोई अन्य विकल्प नहीं है'। लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद शिंदे नीत महायुति सरकार ने कई कल्याणकारी पहल शुरू की, जिनमें ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ भी शामिल है, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये दिए जाते हैं।

महाराष्ट्र में गूंजने लगे ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारे

कल्याणकारी उपायों और विकास के वादों के साथ शुरू हुए प्रचार अभियानों में ‘बंटेंगे तो कटेंगे’, ‘एक हैं तो सेफ हैं’, ‘वोट जिहाद’ और ‘धर्म युद्ध’ जैसे नारे धीरे-धीरे हावी हो गए, जिस पर पंकजा मुंडे और अशोक चव्हाण जैसे भाजपा नेताओं और प्रमुख सहयोगी अजित पवार ने भी चिंता जतायी। फडणवीस ने कहा कि नेता नारे के माध्यम से दिए गए एकता के 'मूल संदेश' को नहीं समझ पाए हैं। फडणवीस ने हाल ही में कहा, 'प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘एक हैं तो सेफ हैं’ के नारे में इसे स्पष्ट रूप से कहा है।' उन्होंने कहा कि यह नारा एकता की बात कहता है।

स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे कहीं दब गए

चुनाव प्रचार के शोर में रोजगार सृजन, निवेश बढ़ाने, किसानों का पलायन, महंगी होती स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे मुद्दे कहीं दब गए हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में कृषि संकट, सोयाबीन और कपास की कीमतों में गिरावट और कृषि श्रमिकों की कमी जैसे मुद्दे प्रमुख हैं, लेकिन राजनीतिक चर्चा से लगभग गायब हैं। मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे भी राज्य के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर मतदाताओं से समुदाय के लिए आरक्षण का विरोध करने वालों को पराजित करने का आग्रह कर रहे हैं। जरांगे ने चुनाव मैदान में नहीं उतरने का फैसला किया था।

चुनाव के लिए प्रचार करने वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाद्रा, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शामिल रहे। राज्य की 288 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव के लिए 20 नवंबर होने वाले मतदान में 9.7 करोड़ लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के पात्र हैं।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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