बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों पर हमारी सीरीज 'मुख्यमंत्री' के तहत आज बात 15वें मुख्यमंत्री रामसुंदर दास तक पहुंच गई है। रामसुंदर दास की बात हो रही है तो उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफे को लेकर भी चर्चा होगी ही। रामसुंदर दास ने 21 अप्रैल 1979 को बिहार के 15वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी। लेकिन इससे पहले आरक्षण और भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर कर्पूरी ठाकुर की सरकार और जनता पार्टी में असंतोष फैला और वह अलोकप्रिय हो गए। पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने हालात का जायजा लेने के लिए समर गुहा को पटना भेजा और उन्होंने एक-एक विधायक से बात की। बस फिर क्या था कर्पूरी ठाकुर को इस्तीफा देना पड़ा और वह भूतपूर्व हो गए। इसके बाद नए नेता का चुनाव होना था। बिहार में पार्टी के अध्यक्ष सत्येंद्र नारायण सिंह सबसे बड़े नेता थे, लेकिन उन्होंने स्वयं ही सोनपुर के विधायक रामसुंदर दास का नाम आगे बढ़ा दिया। रामसुंदर दास के नाम पर सभी गुटों ने हामी भर दी। लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने सत्येंद्र नारायण के करीबी रहे जगेश्वर मंडल का नाम आगे बढ़ा दिया। हालांकि, जगेश्वर पीछे हट गए और बिना वोटिंग के फैसला हो गया। इस तरह रामसुंदर दास का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया और 21 अप्रैल को उन्होंने शपथ भी ले ली।
कौन थे बिहार के 15वे मुख्यमंत्री रामसुंदर दास
रामसुंदर दास का जन्म सारण जिले में सोनपुर इलाके के गंगाजल नामक गांव में 9 जनवरी 1921 को हुआ था। उनके पिता दैनिक मजदूर थे। रामसुंदर दास ने सोनपुर और कोलकाता में अपनी पढ़ाई की। 1945 में वह पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में भी कूद पड़े। बाद में टीचर बने और समाजवादी धड़े की राजनीति करने लगे। वह आचार्य नरेंद्र देव की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए।
रामसुंदर दास को हार मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा) ने रामसुंदर दास को 1957 के विधानसभा चुनाव में हाजीपुर सुरक्षित सीट से अपना उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह चुनाव हार गए। हार मिली, लेकिन वह संगठन के कामों में जुटे रहे। 1964 में प्रसोपा ने उन्हें विधान परिषद के लिए अपना उम्मीदवार बना दिया। लेकिन यहां भी उनकी राह आसान नहीं थी, क्योंकि उनके विरोधी गुट कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी ने यमुना सिंह को निर्दलीय मैदान में उतार दिया। एक बार फिर रामसुंदर दास को हार का मुंह देखना पड़ा। 1968 में विधान परिषद चुनाव हुए तो उन्हें जीत मिली और वह सदन में पहुंच गए।
रामसुंदर दास मुख्यमंत्री और कर्पूरी की अदावत
इस बीच प्रसोपा में टूट भी हुई और नए राजनीतिक समीकरण भी बनते-बिगड़ते रहे। 1977 में देश से आपातकाल हटा और लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई। इस बीच उत्तर भारत की ज्यादातर विपक्षी पार्टियां इकट्ठा हो गईं और जनता पार्टी के नाम से नया संगठन बना। यह सभी पूर्व पार्टियां, जनता पार्टी में अलग-अलग गुट बन गए। 1977 के ही बिहार विधानसभा चुनाव में रामसुंदर दास ने सोनपुर सीट से जीत दर्ज की। जनता दल ने कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन उनकी सरकार 1 साल 301 दिन चली और फिर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उनके बाद रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली।
रामसुंदर दास मुख्यमंत्री तो बन गए थे, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने अब भी हार नहीं मानी थी। उन्होंने कौमी एकता मंच के नाम से एक गैर-राजनीतिक मंच बनाया और बिहार के दौरे पर चले गए। कुल मिलाकर सत्ता भले हाथ से चली गई हो, लेकिन कर्पूरी हार मानने वाले नहीं थे।
सीएम की कुर्सी पर रामसुंदर दास का आसान नहीं रहा सफर
जब रामसुंदर दास को गद्दी मिली, उस समय जमशेदपुर शहर दंगों से जूझ रहा था। उन्होंने इन दंगों पर काबू पाया और फिर प्रशासनिक मशीनरी को सुधारने का बीड़ा उठाया। हालांकि, उन्होंने कर्पूरी के समय के ही प्रशासनिक अधिकारियों से काम करवाया। यहां तक कि कर्पूरी ठाकुर के समय नियुक्त हुए मुख्य सचिव यशवंत सिन्हा को भी नहीं हटाया। बिहार में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार गिर गई। इसका असर बिहार पर पड़ता, उससे पहले ही रामसुंदर दास ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और निर्दलीयों को साधकर अपनी सरकार बचा ली। इंदिरा कांग्रेस ने भी उन्हें बाहर से समर्थन दिया। 8 अक्टूबर 1979 को पटना में जेपी की मृत्यु हो गई और इसके दो महीने बाद देश में लोकसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस को जीत मिली और जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गई।
इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दी सरकार
इंदिरा गांधी ने जनवरी में प्रधानमंत्री बनने के बाद 17 फरवरी को बिहार सहित 9 राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त कर दिया। इस तरह 17 फरवरी 1980 को रामसुंदर दास की मुख्यमंत्री पद से विदायी हो गई। वह 302 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। मई 1980 में फिर बिहार विधानसभा चुनाव हुए तो जनता पार्टी को करारी हार मिली। स्वयं रामसुंदर दास भी सोनपुर सीट से चुनाव हार गए। उन्हें चौधरी चरण सिंह की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवार लालू प्रसाद पासवान ने हरा दिया। 1984 के लोकसभा चुनाव में रामसुंदर दास ने पलामू सीट से चुनाव लड़ा और यहां भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
दोबारा मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए रामसुंदर दास
1989 के लोकसभा चुनाव से पहले सोशलिस्ट विचारधारा के दल एक बार फिर इकट्ठा हुए और जनता दल बनाया गया। रामसुंदर दास बिहार में जनता दल के अध्यक्ष भी बन गए। चुनाव में कांग्रेस को हार मिली और लेफ्ट फ्रंट व भाजपा के सहयोग से जनता दल ने केंद्र में सरकार बनाई। 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना बड़ा और जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बन गई। उनको भाजपा, लेफ्ट फ्रंट और झारखंड मुक्ति मोर्चा का भी साथ था। एक बार फिर रामसुंदर दास मुख्यमंत्री बनने वाले थे। लेकिन बात वोटिंग तक आयी तो वह लालू प्रसाद यादव से 3 वोट से हार गए और बिहार में लालू राज की शुरुआत हुई। 1991 में रामसुंदर दास हाजीपुर से सांसद चुने गए और 2009 में JDU की टिकट पर वह हाजीपुर से ही सांसद बने। 2014 में उन्होंने आखिरी चुनाव लड़ा और हाजीपुर में रामविलास पासवान से हार गए। 6 मार्च 2015 को 94 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।
