Engineering Biology kya hai: भारत में पढ़ाई और करियर के पारंपरिक तरीकों में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है। केंद्र सरकार देश में पहली बार एक बिल्कुल नया और अनोखा कोर्स शुरू करने जा रही है, जिसका नाम है इंजीनियरिंग बायोलॉजी। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 16 जुलाई को नीति आयोग के एक कार्यक्रम के दौरान इस ऐतिहासिक फैसले का ऐलान किया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यह भारत में अपनी तरह का पहला कोर्स होगा, जो आने वाले समय की जरूरतों को देखते हुए देश में विशेषज्ञों की एक नई फौज तैयार करेगा।
मेडिकल और इंजीनियरिंग की दूरियां होंगी खत्म
अक्सर माना जाता है कि बायो और मैथ दो अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन यह नया कोर्स इन दोनों धाराओं को आपस में जोड़ देगा। केंद्रीय मंत्री ने समझाया कि आज के दौर में चिकित्सा का क्षेत्र बहुत तेजी से बदल रहा है। अब ऐसी आधुनिक तकनीकें आ चुकी हैं जहां डॉक्टरों और इंजीनियरों को एक साथ मिलकर काम करना होगा।
उदाहरण के लिए, आज तक अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी आधुनिक जांच मशीनों को केवल रेडियोलॉजिस्ट (डॉक्टर) ही ऑपरेट और समझते थे। लेकिन आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी इन रेडियोलॉजिस्ट के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे, ताकि बीमारियों का और सटीक इलाज खोजा जा सके।
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2047 तक बहुत बड़ा दांव: 2.6 ट्रिलियन डॉलर की बायोइकोनॉमी
इस कोर्स को शुरू करने के पीछे सरकार का एक बहुत बड़ा आर्थिक और वैज्ञानिक लक्ष्य है। सरकार का इरादा है कि भारत को बायोइकोनॉमी यानी जैव-अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया का लीडर बनाया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए साल 2047 तक भारत की बायोइकोनॉमी को 2.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का एक बड़ा टारगेट सेट किया गया है। इसके लिए देश को भारी संख्या में ऐसे युवाओं की जरूरत होगी जो बायोलॉजी और इंजीनियरिंग दोनों की भाषा समझते हों।
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इस कोर्स में आने वाले छात्रों को जेनेटिक्स, सेल्युलर बायोलॉजी के साथ-साथ कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स और मशीन लर्निंग भी सीखनी होगी। यह कोर्स उन छात्रों के लिए बेहतरीन साबित होगा जो किसी एक विषय के दायरे में बंधकर नहीं रहना चाहते।
केवल आईटी सेक्टर पर निर्भरता होगी कम
भारत में पिछले दो दशकों से इंजीनियरिंग का मतलब सिर्फ कंप्यूटर साइंस या आईटी जॉब्स माना जाता रहा है। लेकिन इस कोर्स के आने के बाद कोर साइंटिफिक रिसर्च में नौकरियों की बाढ़ आने वाली है। सिंथेटिक बायोलॉजी, बायो-फार्मास्यूटिकल्स, एडवांस्ड मेडिकल डिवाइसेज और एआई-संचालित हेल्थकेयर टूल्स बनाने वाली देशी-विदेशी कंपनियां इन ग्रेजुएट्स को हाथों-हाथ लेंगी। यह भारतीय इंजीनियरों के लिए पारंपरिक कोडिंग से हटकर कुछ बड़ा करने का मौका होगा।
चूंकि यह कोर्स भारत में बिल्कुल नया है, इसलिए शुरुआत में देश के चुनिंदा शीर्ष संस्थानों (जैसे आईआईटी, आईआईएससी या एम्स से जुड़े चुनिंदा सेंटर्स) में ही इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किए जाने की संभावना है। शुरुआती बैच के छात्रों के सामने यह चुनौती होगी कि इसके लिए पूरी तरह से तैयार लैब्स और पूरी तरह से अनुभवी फैकल्टी मिलने में थोड़ा समय लग सकता है। इसलिए इसमें रिसर्च और खुद से सीखने का जज्बा रखने वाले छात्रों को ही आगे आना चाहिए।
