Ramdhari Singh Dinkar: रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के वे कवि हैं, जिन्होंने अपनी कविता के जरिये देशभक्ति, वीरता और नैतिकता का संदेश देने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। रामधारी सिंह दिनकर हमेशा से ही हिंदी साहित्य के जाने-माने कवि कहलाते रहे हैं। 23 सितंबर साल 1908 को जन्मे रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं का सफर साल 1953 में शुरू हुआ था और फिर दिल्ली, कश्मीर और रांची होते हुए आखिरकार 1961 में जाकर पूरा हुआ। उनकी कविताओं की एक-एक पंक्तियां अपने आप में जोश से भर देने का दम रखती हैं। आइये जानते हैं उनकी प्रसिद्ध कविताओं के बारे में, जो छात्रों को प्रेरित करती हैं।
रामधारी सिंह दिनकर की कई सारी रचनाएं बेहद शानदार हैं और छात्रों के लिए प्रेरणादाई हैं। उनकी कृति की लाइनें 'कोरा किताबी ज्ञान मनुष्य को कभी धोखा भी दे सकता है, किंतु संघर्षों से निकली हुई शिक्षा कभी भी झूठी नहीं होती।' बेहद मशहूर है। नीचे उनकी लिखी कुछ प्रमुख कविताएं हैं, जो छात्रों को प्रेरणा देती हैं।
कुंभकरण की नींद
कुंभकरण सोया हुआ है गहरी नींद में,
नींद में नहीं है वो, पर क्या जगता है वह?
अंधकार से भरा हुआ है उसका मन,
सपनों में जूबा हुआ है उसका तन।
देश की पुकार सुनता नहीं वह,
जनता की पीड़ा को समझता नहीं वह।
उठो, जागो यह समय है संघर्ष का,
नहीं तो सदा रहेगा अंधकार का वास।
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है,
साहस हो तो सपनों को सच करने की ताकत मिलती है।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।
स्वाधीनता केवल अधिकार नहीं, यह जिम्मेदारी भी है।
आग जो भीतर जलती है, वही क्रांति का शंखनाद करती है।
परिश्रम ही वह कुंजी है, जो असंभव को संभव बना देती है।
जहां अपमान सहा जाए, वहीं विद्रोह जन्म लेता है।
संघर्ष ही जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक है।
जिसे अपने बल पर विश्वास हो, उसे हार कौन दिला सकता है।
वीरता वही है जो कठिनाइयों में मुस्कान बनाए रखे।
उर्वशी
कवि पहले चाहता है कि कविता उसे पकड़ ले,
और फिर जब कविता उसे पकड़ लेती है...
तब कवि को न सोते बनता है और न जागते बनता है।
अधूरी कविता क्षण-क्षण उसके दिमाग में सुई चुभोती रहती है।
और जब तक कविता पूरी न हो जाए,
कवि दिन-रात परेशानी में पड़ा रहता है।
कलम आज उनकी जय बोल
जला अस्थियां बारी-बारी,
चिटकाई जिनमें चिंगरी,
जो चढ़ गई पुण्यवेदी पर
बिना लिए गर्दन का मोल
कलम आज उनकी जय बोल।
चांद
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चांद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर बैचेन हो जगता, न सोता है।
आसान नहीं थी 'उर्वशी' की रचना
रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध कृतियों में से एक है उर्वशी। आकाशवाणी के प्रसिद्ध अधिकारी करतार सिंह दुग्गल ने उनसे कहा कि वे रेडियो प्रसारण के लिए कोई बढ़िया पद्द लिखें। इसके बाद उन्होंने उर्वशी की रचना की। ऊपर लिखी पंक्तियां रामधारी सिंह दिनकर की ही जिंदगी पर आधारित है, जब उन्होंने अपने मशहूर लेख उर्वशी की रचना की थी। तभी उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। दिनकर ने खुद ये बात मानी कि जितनी मुश्किल उन्हें उर्वशी काव्य को लिखने में हुई, उतनी मुश्किल किसी और काव्य को लिखने में कभी नहीं हुई।
