विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए आयोजित होने वाली फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) को लेकर जारी विवाद के बीच नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने साफ किया है कि वह अभ्यर्थियों की वास्तविक और जायज चिंताओं पर विचार करने को तैयार है, लेकिन भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए जरूरी न्यूनतम दक्षता के मानकों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। दरसअल, जून 2026 में आयोजित FMGE परीक्षा के बाद अभ्यर्थियों की ओर से परीक्षा की कठिनाई, वीडियो आधारित सवालों और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद NBEMS की ओर से गठित तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने परीक्षा को अधिक पारदर्शी और अभ्यर्थी-अनुकूल बनाने के लिए कई सुझाव दिए हैं। समिति की अध्यक्षता एयर मार्शल (डॉ.) पवन कपूर (सेवानिवृत्त) ने की।
विशेषज्ञ समिति ने FMGE को साल में तीन बार आयोजित करने की संभावना पर विचार करने की सिफारिश की है। इसके अलावा परीक्षा शुल्क की समीक्षा, परीक्षा केंद्रों की सुविधाओं में सुधार और अभ्यर्थियों को उनके रिकॉर्ड किए गए उत्तर देखने की सुविधा देने पर भी विचार करने को कहा गया है। हालांकि, रिकॉर्ड किए गए उत्तर उपलब्ध कराने के मामले में तकनीकी और कानूनी सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखने की बात कही गई है।
सवालों का स्तर
समिति ने परीक्षा में बेहतर संतुलन के लिए प्रश्नपत्र की कठिनाई का एक तय ढांचा बनाने का सुझाव दिया है। इसके तहत करीब 30 प्रतिशत सवाल आसान, 50 प्रतिशत मध्यम और 20 प्रतिशत कठिन स्तर के रखने की सिफारिश की गई है। साथ ही प्रश्नपत्र का औसत कठिनाई स्तर 5.5 से अधिक नहीं रखने का सुझाव दिया गया है हालांकि, विशेषज्ञ समिति ने जून 2026 की परीक्षा में ग्रेस अंक देने की सिफारिश नहीं की है। समिति को वीडियो आधारित सवालों या प्रश्नपत्र की कुल कठिनाई के कारण परीक्षा परिणाम प्रभावित होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।
बार-बार परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों का पास प्रतिशत लगातार कम
FMGE के प्रयास के हिसाब से जारी आंकड़े भी इस पूरे विवाद में अहम तस्वीर सामने रखते हैं। जून 2026 में पहली बार परीक्षा देने वाले 35.74 प्रतिशत अभ्यर्थी पास हुए। वहीं दूसरी बार परीक्षा देने वालों का पास प्रतिशत 21.45 प्रतिशत रहा। पांच से अधिक बार परीक्षा दे चुके अभ्यर्थियों में सिर्फ 3.29 प्रतिशत उम्मीदवार ही सफल हो सके। दिसंबर 2025 में पहली बार परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों का पास प्रतिशत 47.53 प्रतिशत था, जबकि पांच से अधिक प्रयास करने वाले अभ्यर्थियों में यह आंकड़ा महज 5.58 प्रतिशत रहा।
NBEMS के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, इन आंकड़ों को केवल कुल पास प्रतिशत के आधार पर नहीं देखा जा सकता। अधिकारी का कहना है कि किसी पूरे परीक्षा बैच को अनुचित परीक्षा का सामना करना पड़ा, ऐसा निष्कर्ष सिर्फ कुल परिणाम के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा। NBEMS का उद्देश्य परीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखना है, लेकिन इसके साथ मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी चिकित्सकीय दक्षता का न्यूनतम स्तर भी बनाए रखना होगा।
FMGE प्रवेश परीक्षा नहीं, स्क्रीनिंग परीक्षा
अधिकारियों के मुताबिक FMGE कोई प्रतियोगी प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले स्नातकों की स्क्रीनिंग परीक्षा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत में मरीजों का इलाज करने से पहले डॉक्टर न्यूनतम आवश्यक चिकित्सकीय दक्षता रखते हों। मेडिकल क्षेत्र में डॉक्टरों को हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सेप्सिस, जटिल गर्भावस्था और बच्चों से जुड़ी गंभीर आपात स्थितियों जैसी परिस्थितियों से निपटना पड़ सकता है। ऐसे में परीक्षा के न्यूनतम योग्यता मानक को बनाए रखना सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
कोचिंग और विदेशी मेडिकल शिक्षा से जुड़े हितों पर भी सवाल
इस बीच, छात्र समुदाय के कुछ वर्गों ने FMGE आंदोलन में विदेशी मेडिकल कंसल्टेंसी और कोचिंग से जुड़े व्यावसायिक हितों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि विदेश में मेडिकल शिक्षा के लिए छात्रों को भेजने वाले व्यावसायिक संस्थानों का इस पूरे मुद्दे में संभावित हित हो सकता है। NBEMS की ओर से स्पष्ट किया गया है कि अभ्यर्थियों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करने और परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी कदमों पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, परीक्षा के बुनियादी योग्यता मानकों को कमजोर करने का कोई सवाल नहीं है।
कुल मिलाकर, FMGE को लेकर NBEMS का रुख साफ है परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों की जायज चिंताओं का समाधान किया जाएगा, लेकिन भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए जरूरी न्यूनतम दक्षता और मरीजों की सुरक्षा के मानकों से समझौता नहीं होगा।
