देवभूमि उत्तराखंड अपनी संस्कृति और धार्मिक स्थलों के लिए मशहूर है। यहां अलग-अलग तरह के त्योहार और परंपराएं देखने को मिलती हैं। उन्हीं में से एक है त्योहार है यहां का लोसर, जो यहां की मान्यताओं और परंपराओं से रूबरू कराता है। इस त्योहार को भारत-चीन सीमा से सटे गांवों में भोटिया जनजाति समाज के लोग मनाते हैं। इस त्योहार पर भोटिया और तिब्बती समुदाय की सांस्कृतिक का अद्भुत नजारा देखने को मिलती है।
उत्तरकाशी में भी भोटिया समुदाय के लोगों द्वारा लोसर पर्व को मनाया जाता है, जिसमें वीरपुर और डुंडा समेत अन्य क्षेत्रों में भी लोसर मनाया जाता है। यहां के रिंगाली देवी मंदिर में लगभग 300 से ज्यादा परिवार एकत्र होते हैं, जहां पारंपरिक परिधान पहनकर महिलाएं नृत्य भी करती हैं।
चौथे दिन खेली जाती है होली
यहां के मंदिर में भारी अनुष्ठान करते हैं। वहीं दूसरे दिन घर-घर जाकर हरियाली बांटी जाती है और बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है। तीसरे दिन ब्याही गई बेटियों को मायके बुलाया जाता है और उनका आदर सत्कार किया जाता है, जिसके बाद चौथे दिन आटे की होली खेली जाती है। इस दिन यहां एक दूसरे पर आटा लगाकर त्योहार को मनाते हैं। सभी पारंपरिक वेशभूषा पहन कर स्थानीय लोक गीतों पर नाचते-गाते हैं।
क्यों मनाते हैं लोसर ?
लोसर पर कई क्षेत्रों में लोसर पर्व के अवसर पर दीपावली की तरह दीए भी जलाए जाते हैं। होली खेली जाती है। यहां के लोग बौद्ध पंचांग के अनुसार लोसर पर्व नए साल के आगमन पर मनाते हैं। इस दिन ही तिब्बत की देवी पाल्डेन ल्हामो की आराधना होती है। पूर्वजों को भी याद किया जाता है।
15 दिनों का होता है लोसर
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं, नैनीताल, उत्तरकाशी समेत कुछ अन्य क्षेत्रों में भी लोसर मनाया जाता है। हिमाचल, लद्दाख, नेपाल में भी भोटिया और तिब्बती समुदाय के लोग इसे धूमधाम से मनाते हैं। सभी लोग धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। यह त्योहार लगभग 15 दिनों तक चलता है।
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