लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (फोटो: ANI)
Om Birla CPA Zone III Conference: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे विधायी संस्थाओं के सुचारू और व्यवस्थित संचालन को सुनिश्चित करके उनकी गरिमा बनाए रखें। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र शांतिपूर्ण, सुनियोजित और सूचनाप्रद चर्चाओं के माध्यम से मुद्दों को उठाने, चिंताएँ व्यक्त करने और बहस में शामिल होने के पर्याप्त अवसर प्रदान करता है। कोहिमा स्थित नागालैंड विधानसभा में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए), भारत क्षेत्र, ज़ोन-III के वार्षिक सम्मेलन के अवसर पर मीडियाकर्मियों से बात करते हुए, उन्होंने आगाह किया कि सुनियोजित व्यवधान न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करते हैं, बल्कि नागरिकों को सार्थक विचार-विमर्श और जवाबदेही से भी वंचित करते हैं। 1 दिसंबर 2025 से शुरू होने वाले संसद के आगामी शीतकालीन सत्र का उल्लेख करते हुए, बिरला ने सभी राजनीतिक दलों से सदन की कार्यवाही का सुचारू संचालन सुनिश्चित करने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि पारदर्शी शासन और कल्याणकारी नीति निर्माण के लिए विधानमंडलों को अधिक सक्रिय और रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। इस वर्ष के सम्मेलन का विषय है “नीति, प्रगति और नागरिक: परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में विधायिका।” बिरला ने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन के दौरान सार्थक विचार-विमर्श से पूर्वोत्तर की विधायिकाओं को अधिक सशक्त, जवाबदेह और कुशल बनाने के उद्देश्य से ठोस कार्य योजनाएं तैयार होंगी।
इससे पहले, राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) भारत क्षेत्र, जोन-III सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए, अध्यक्ष ने यह ज़ोर दिया कि विधानमंडलों को जनमत को नीति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। ओम बिरला ने कहा कि विधानमंडलों का दायित्व केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें लोगों की आकांक्षाओं और सरोकारों को कार्यान्वयन योग्य नीतियों में बदलना भी आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि व्यापक विकास केवल सक्रिय जनभागीदारी से ही संभव है, और सच्ची प्रगति तब होती है जब नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं। इसलिए जनप्रतिनिधियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नीति निर्माण में नागरिकों की आवाज सार्थक रूप से प्रतिबिंबित हो। अध्यक्ष ने लोकतंत्र को नागरिकों के निकट लाने में नई तकनीकों और नवाचारों के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अधिकांश विधानमंडल अब पेपरलेस बन गए हैं और डिजिटल प्रणालियों को अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत के लोग लोकतंत्र की नींव हैं और संविधान-निर्माताओं ने इसी सिद्धांत को सर्वोपरि रखा। उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक शासन का आधार होना चाहिए। ओम बिरला ने सभी विधायी निकायों से आग्रह किया कि वे विधायी प्रक्रिया में व्यापक जन भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करें, नागरिक-अनुकूल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराएँ और बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने के लिए समुचित तंत्र विकसित करें। उन्होंने आगे कहा, "जब किसी राज्य में जनमत नीति का आधार बनता है, तो वह राज्य निरंतर और सतत विकास प्राप्त करता है।"
अध्यक्ष ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विधानमंडलों में हो रहे उल्लेखनीय डिजिटल परिवर्तन की सराहना की और इसे आधुनिक तथा पारदर्शी शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने विशेष रूप से नागालैंड विधानसभा के पूरी तरह से पेपरलेस होने की प्रशंसा की और इसे भारत में डिजिटल शासन का एक अग्रणी मॉडल बताया। बिरला ने कहा कि इस तरह की डिजिटल पहल न केवल दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाती है, बल्कि विधायी कार्यप्रणाली को अधिक सुलभ और जन-केंद्रित भी बनाती है। साथ ही, उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के गैर-जिम्मेदार उपयोग के बारे में सतर्क करते हुए विधायकों से एआई को इस तरह अपनाने का आग्रह किया जिससे पारदर्शिता बढ़े, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मज़बूत हों और विधायी कार्यवाही में बाधा न आए। केंद्र और राज्यों के संबंधों के बारे में उन्होंने कहा कि यद्यपि सरकार का प्रत्येक स्तर स्पष्ट रूप से परिभाषित संवैधानिक ढांचों के भीतर कार्य करता है, फिर भी ठोस परिणाम हासिल करने के लिए दोनों के बीच प्रभावी सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र और राज्यों के बीच रचनात्मक संवाद न केवल शासन को मजबूत करता है, बल्कि ऐसी नीतियों का निर्माण भी करता है जो उत्तरदायी, समावेशी और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप होती हैं। बिरला ने आगे कहा कि हाल के वर्षों में बेहतर सहयोग से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अवसंरचना, संपर्क और सार्वजनिक सेवाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप पूर्वोत्तर को विकास का केंद्र बनाने और भारत की एक्ट ईस्ट नीति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करने के लिए ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों के समग्र विकास के लिए व्यापक कार्य योजना की आवश्यकता पर जोर देते हुए, ओम बिरला ने इस क्षेत्र की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ऐसी कार्य योजना में प्राकृतिक आपदाओं सहित जलवायु संबंधी उभरते जोखिमों का विशेष रूप से समाधान किया जाना चाहिए, क्योंकि ये क्षेत्र की आजीविका और अवसंरचना पर गहरा प्रभाव डालते हैं। सतत और समावेशी विकास के महत्व पर जोर देते हुए, अध्यक्ष ने कहा कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विकास से जुड़ी रणनीतियों में दीर्घकालिक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए जलवायु रेजिलिएंस, हरित अवसंरचना और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी शामिल होनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए इसकी अपार क्षमता का दोहन करने के लिए केंद्र, राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग आवश्यक है।
ओम बिरला ने कहा कि यह गर्व की बात है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सभी विधानमंडल स्थानीय आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के प्रति सजग रहते हुए सामूहिक विचार-विमर्श और निर्णय लेने की परंपरा को कायम रख रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये विधानमंडल शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं, जो सहभागी लोकतंत्र की सच्ची भावना को दर्शाता है। लोकसभा अध्यक्ष ने आगे कहा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में विशेषकर सड़क, रेल और हवाई संपर्क सहित अवसंरचना के विकास में तेजी से प्रगति हो रही है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। इस क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए, बिरला ने कहा कि इसकी जीवंत संस्कृति, समृद्ध परंपराएं और प्राकृतिक सौंदर्य इसे वास्तव में अद्वितीय बनाते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्थानीय उत्पादों, कलाओं, संस्कृति और पारंपरिक शिल्पों को बढ़ावा देना आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अध्यक्ष ने विधानमंडलों से आग्रह किया कि वे ऐसी नीतियां अपनाएं जो उद्योग और उद्यमिता को प्रोत्साहित करें, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए अधिक अवसर पैदा हों और व्यापक आर्थिक सशक्तिकरण संभव हो।
अपने संबोधन के समापन में, ओम बिरला ने विश्वास व्यक्त किया कि सीपीए भारत क्षेत्र, जोन-III के दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान पूरे क्षेत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाने, विधायी प्रथाओं को सुधारने और शासन में जनता के विश्वास को बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव सामने आएंगे। उन्होंने आगामी हॉर्नबिल महोत्सव से पहले सभी प्रतिनिधियों को शुभकामनाएं दी और इसे नागालैंड की संस्कृति, रेजिलिएंस, कलात्मकता और सामुदायिक भावना का वैश्विक उत्सव बताया। नागालैंड में गर्मजोशी से मिले आतिथ्य का सराहना करते हुए, अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे आयोजन उत्तर-पूर्वी राज्यों की विधानसभाओं के बीच घनिष्ठ संबंधों को बढ़ावा देते हैं और क्षेत्रीय विकास तथा प्राथमिकताओं पर सामूहिक चिंतन के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं। सम्मेलन के दौरान सार्थक विचार-विमर्श की उम्मीद जताते हुए, उन्होंने कहा कि "नीति, प्रगति और नागरिक: परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में विधानमंडल" विषय पर चर्चा से उत्तर-पूर्वी राज्यों की विधानसभाओं को अधिक सशक्त, जवाबदेह और कुशल बनाने के लिए ठोस कार्य योजनाएं तैयार की जा सकती हैं। कार्यक्रम में नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो; राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश; नागालैंड विधानसभा के अध्यक्ष शारिंगेन लोंगकुमेर और नागालैंड सरकार के संसदीय कार्य मंत्री के.जी. केन्ये ने भी सभा को संबोधित किया। भारत के आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों के विधानमंडल सीपीए जोन-III के सदस्य हैं। इस सम्मेलन में आठ में से सात सदस्य राज्यों की विधानसभाओं ने भाग लिया। कुल 12 पीठासीन अधिकारी इसमें शामिल थे, जिनमें सात अध्यक्ष और पांच उपाध्यक्ष शामिल थे। क्षेत्र के संसद और विधानसभा के अन्य सदस्यों ने भी सम्मेलन में भाग लिया।
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