ग्वालियर: मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव (Madhya Pradesh Assembly Election 2023) के लिए नामांकन के बाद जनसभाएं कर प्रत्याशी मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। कई बड़ी सियासी उठापठक के बीच बीजेपी और कांग्रेस पार्टी सत्ता की चाबी हथियाने के लिए जोर आजमाइश कर रही है। वहीं, 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खेवनहार रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बार बीजेपी की गाड़ी में सवार हैं। सिंधिया परिवार कांग्रेस पार्टी की विचारधारा के अलावा बीजेपी के साथ भी राजनीति में सक्रिय रहा है। लेकिन, महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया को भगवा रथ पर सवार होकर चुनावी नैया पार करने में कितनी आसानी और कितनी कठिनाई होने वाली है, इस पर तो आने वाले समय में चुनाव परिणाम ही मुहर लगाएंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो ग्वालियर संभाग में सिंधिया परिवार की तूती बोलती रही है, लेकिन पार्टी में पाला बदलने के बाद महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक रसूख कम हुआ है। आज हम इस आर्टिकल में ग्वालियर सिंधिया परिवार की राजनीति में एंट्री और वर्तमान में बढ़ते कद के बारे में बात करेंगे।
जयविलास महल रजवाड़ों की राजनीति का केंद्र
ग्वालियर का जयविलास महल रजवाड़ों की राजनीति का एक प्रमुख केंद्र रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के गांधी दौर में सिंधिया राजघराने के राजा जीवाजीराव सिंधिया का झुकाव गांधी जी की ओर हुआ। 1947 में आजादी के बाद महाराज जीवाजीराव सिंधिया ने ग्वालियर रियासत को भारत में विलय की स्वीकृति दे दी। कहा जाता है जब देश के मध्य में स्थित अलग-अलग रियासतों को जोड़कर मध्य भारत नाम का एक राज्य बनाया गया तो ग्वालियर परिवार के मुखिया जिवाजीराव इसकी धुरी थे। वैसे तो जिवाजीराव की राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन, ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया परिवार के प्रभाव के कारण कांग्रेस चाहती थी कि जिवाजीराव कांग्रेस में शामिल हो जाएं। हालांकि, जिवाजीराव राजनीति से दूर रहे, लेकिन उनकी पत्नी विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और कांग्रेस के टिकट पर 1957 में गुना से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीतकर आधिकारिक तौर पर राजनीति में एंट्री कर ली। यहीं से सिंधिया परिवार का भारतीय राजनीति में सुहाना सफर शुरू हो जाता है।
सिंधिया परिवार का रसूख कायम
तभी से सिंधिया परिवार का भारतीय राजनीति में रसूख कायम है। विजयाराजे सिंधिया रिकॉर्ड 8 बार सांसद रहीं। उन्हें 2 बार कांग्रेस से 1 बार निर्दलीय, एक बार 1 जनसंघ और 4 बार बीजेपी से सांसद बनने का गौरव हासिल हुआ। 1967 में विजया राजे ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया। चूंकि, सिंधिया परिवार ग्वालियर क्षेत्र में पहले से मजबूत थी। लिहाजा, विजयाराजे ने लोकसभा चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर लड़ा और जीत भी दर्ज की। विजयाराजे सिंधिया 1980 में नवगठित भारतीय जनता पार्टी की उपाध्यक्ष बनाई गईं। वो बीजेपी की संस्थापक सदस्यों में थीं। लेकिन, यह बात उनके बेटे माधव राव सिंधिया को रास नहीं आई और उन्होंने मां से बगावत कर कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा। इसके बाद खुद माधवराव सिंधिया 9 बार सांसद रहे। हालांकि, उनकी बहन वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम लिया। मध्य प्रदेश की राजनीति में नया मोड़ तब आया, जब विजयाराजे ने 1989 के आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर गुना लोकसभा से चुनाव लड़ा और एक लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की। इसके बाद वो आजीवन बीजेपी में हीं रहीं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया का करियर
वर्तमान में मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया परिवार की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। सिंधिया परिवार के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया साल 10 मार्च 2020 को कांग्रेस से इस्तीफा देते हुए बीजेपी में शामिल हो गए। 56 साल पहले 1967 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की वजह से कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई थी। लेकिन 2020 में उनके पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया की वजह से कमलनाथ सरकार सत्ता से बेदखल हो गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं। उनके पास नागरिक उड्डयन मंत्रालय है।
ज्योतिरादित्य ने साल 2002 में पहली बार पिता माधव राव सिंधिया के देहांत के बाद उनकी पारंपरिक गुना सीट से उपचुनाव लड़ा और सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे। 2004 में भी उन्होंने इसी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर राज किया। इसके बाद वह 2009 और 2014 में भी गुना से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। लेकिन, 2019 में बीजेपी प्रत्याशी ने ज्योतिरादित्य को उनकी पारंपरिक सीट से पटखनी दे दी।
मनमोहन सरकार में बने मंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया को 2007 में मनमोहन सरकार में पहली बार केंद्रीय राज्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी मिली। इसके बाद 2012 में भी वो केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। 2019 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश में कोई बड़ा पद देने की बजाय कांग्रेस महासचिव बना दिया। राज्य के 2019 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा माना जा रहा था, लेकिन नतीजों के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद नाराज सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम लिया और अपने पक्ष के 22 विधायकों के साथ शिवराज सिंह चौहान को चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ कर दिया।
