करीब 35 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दो इंजीनियरों को बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने 2002 में दोनों को दोषी ठहराया था, लेकिन अब अदालत ने कहा कि सीबीआई आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। इस फैसले के साथ लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दोनों आरोपियों को राहत मिली। आरोपियों की तरफ से जाने माने वकील समीर चंद्रा ने उनका पक्ष हाईकोर्ट में रखा।
कौन थे आरोपी और किस पद पर थे?
इस मामले में आरोपी दिनेश गर्ग और वीके दत्ता थे। दिनेश गर्ग उस समय बाढ़ नियंत्रण विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात थे, जबकि वीके दत्ता सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर ठेकेदार के प्रतिनिधि से रिश्वत मांगी और ली।
कैसे लगा था रिश्वत लेने का आरोप?
अभियोजन के अनुसार, 20 सितंबर 1991 को शिकायतकर्ता से 1800 रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। आरोप था कि यह रकम दोनों इंजीनियरों के बीच बराबर बांटी जानी थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बिलों के भुगतान को जल्दी कराने के बदले यह रिश्वत मांगी गई। इसी शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया।
कहां और कैसे पकड़े जाने का दावा?
सीबीआई के अनुसार, ट्रैप बिछाकर दोनों आरोपियों को दिल्ली के शास्त्री नगर स्थित बाढ़ नियंत्रण विभाग के कार्यालय में कथित रूप से रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। आरोप था कि वीके दत्ता ने अपने टेबल की दराज में पैसे रखे, जबकि दीनश गर्ग ने अपनी शर्ट की जेब में रकम रखी। इसके बाद टीम ने मौके पर दोनों को पकड़ लिया और पैसे बरामद किए।
इस पूरे मामले की जांच और ट्रैप की कार्रवाई केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने की थी। शिकायत मिलने के बाद एंटी करप्शन ब्रांच ने मामला दर्ज किया और उसी दिन ट्रैप की योजना बनाकर कार्रवाई की। बाद में सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की और मामला अदालत में चला।
अदालत ने डिमांड पर उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिश्वत के मामलों में सबसे जरूरी तत्व मांग का साबित होना है। अदालत ने पाया कि इस मामले में मांग को लेकर गवाहों के बयान स्पष्ट नहीं हैं। ऐसे में यह साबित नहीं हो पाया कि आरोपियों ने वास्तव में रिश्वत मांगी थी। केवल पैसे की बरामदगी को पर्याप्त सबूत नहीं माना गया।
फैसले में कहा गया कि गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास हैं। किसी ने कहा कि दोनों आरोपी एक ही कमरे में थे, तो किसी ने अलग स्थिति बताई। इसके अलावा एफआईआर दर्ज होने के समय और शिकायतकर्ता के पहुंचने के समय में भी अंतर पाया गया। इन खामियों ने अभियोजन के पूरे केस को कमजोर कर दिया।
अदालत ने यह भी पाया कि जिस भुगतान के बदले रिश्वत मांगे जाने का आरोप था, वह वास्तव में लंबित ही नहीं था। विभागीय अधिकारी की गवाही के अनुसार, कुछ मामलों में ठेकेदार को ही पैसे देने थे और बाकी में भुगतान पहले ही हो चुका था। ऐसे में रिश्वत मांगने का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया।
महत्वपूर्ण गवाहों की गैरमौजूदगी भी बनी वजह
हाईकोर्ट ने कहा कि कई अहम गवाहों को पेश नहीं किया गया, जिससे केस और कमजोर हुआ। खासतौर पर ठेकेदार को गवाही के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि वही इस मामले का मुख्य पक्ष था। अदालत ने इसे अभियोजन की बड़ी चूक माना।
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष साबित करने के लिए पुख्ता और ठोस सबूत जरूरी होते हैं। इस केस में कई स्तर पर संदेह पैदा हुआ, जिसे दूर नहीं किया जा सका। इसलिए हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
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