राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जैसे-जैसे ठंड की आहट हो रही है, वैसे-वैसे हवा का जहर भी घुलने लगा है। सर्दियों के मौसम की शुरुआत से पहले ही दिल्ली की आबोहवा खराब होने लगी थी, हालांकि बीती रात हुई बारिश के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक आज सुबह 8 बजे दिल्ली का AQI 172 दर्ज किया गया, जो 'मॉडरेट' (मध्यम) श्रेणी में आता है। इससे पहले शनिवार को दिल्ली का AQI 191 रिकॉर्ड किया गया था। हालांकि बारिश से प्रदूषण के स्तर में कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन आने वाले हफ्तों में हालात के और बदतर होने की आशंका जताई जा रही है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए 'सेंटर फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट' (CAQM) ने दिल्ली में ग्रैप (GRAP) का पहला चरण लागू कर दिया है और दिल्ली सरकार भी विशेषज्ञों के साथ लगातार उच्चस्तरीय बैठकें कर रही है।
सिर्फ आपातकालीन उपायों से हल नहीं होगा संकट: विशेषज्ञ
पर्यावरणविदों और जानकारों का स्पष्ट मानना है कि सर्दियों के महीनों में सिर्फ 'आपातकालीन प्रतिबंध' लगा देने से इस बार-बार आने वाले प्रदूषण के चक्र को तोड़ा नहीं जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, वाहनों के धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, बिजली संयंत्रों और गैसीय प्रदूषकों के खिलाफ पूरे साल लगातार और सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है।
दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम दिल्ली बने बड़े 'हॉटस्पॉट्स'
प्रदूषण नियंत्रण पर हाल ही में हुई एक अहम समीक्षा बैठक का हवाला देते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता और स्वच्छ हवा की पैरोकार भावरीन कंधारी ने बताया कि समीक्षा के दौरान दक्षिण-पश्चिम दिल्ली और पश्चिम दिल्ली को प्रदूषण के प्रमुख हॉटस्पॉट्स के रूप में पहचाना गया है। उन्होंने अधिकारियों से पुरजोर अपील की है कि वे प्रदूषण के इन मुख्य स्रोतों के खिलाफ बिना किसी ढिलाई के सख्त कानूनी कदम उठाएं और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें।
पड़ोसी राज्यों पर ठीकरा फोड़ना गलत: जय धर गुप्ता
एक अन्य पर्यावरण कार्यकर्ता जय धर गुप्ता ने इस मुद्दे पर एक बड़ा सवाल उठाया है। उनका कहना है कि आखिर हर बार दिल्ली के प्रदूषण के लिए मुख्य तौर पर पड़ोसी राज्यों के सिर ही ठीकरा क्यों मढ़ा जाता है? उनका मानना है कि सर्दियों के महीनों में दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता के लिए किसी एक अकेली वजह को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह गलत है। इसके साथ ही उन्होंने हवा की गुणवत्ता मापने वाले डेटा की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं और दावा किया है कि कई मॉनिटरिंग स्टेशन प्रदूषण वाले मुख्य इलाकों को ठीक से कवर नहीं कर रहे हैं।
नवंबर में बढ़ सकती है चुनौती, क्या होंगे असरदार उपाय?
माना जा रहा है कि नवंबर के महीने में तापमान गिरने और हवा की गति धीमी होने के बाद प्रदूषण का स्तर एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच सकता है। ऐसे में यह देखना बेहद अहम होगा कि प्रशासन के उपाय जमीन पर कितने कारगर साबित होते हैं। इन उपायों में ईंधन भरवाने से पहले 'प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र' (PUC) की अनिवार्यता को पूरी सख्ती से लागू करना, होटलों, ढाबों और खुले में कोयला तथा लकड़ी जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध, यातायात का दबाव कम करने के लिए 'वर्क-फ्रॉम-होम' जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना जैसे उपाय शामिल हैं।
