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सरदार तेजा सिंह समुंदरी की 100वीं बरसी पर याद कर भावुक हुआ रकाब गंज साहिब, LG टी.एस. संधू ने दी श्रद्धांजलि

सरदार तेजा सिंह समुंदरी की 100वीं शहादत वर्षगांठ पर नई दिल्ली के गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उपराज्यपाल टी.एस. संधू सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने उनके महान बलिदान, सिख गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में योगदान और सामाजिक क्रांति के प्रति उनके साहसी प्रयासों को नमन किया।

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सरदार तेजा सिंह समुंदरी की 100वीं बरसी पर LG टी.एस. संधू ने दी श्रद्धांजलि

दिल्ली : अकाली आंदोलन के स्तम्भ और सिख गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार सरदार तेजा सिंह समुंदरी की 100वीं शहादत वर्षगांठ पर शनिवार को नई दिल्ली के गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब में एक भव्य श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। भाई लखी शाह वंजारा हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में देश की कई प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की और उनके जीवन-संघर्ष को नमन किया। इस दौरान सरदार समुंदरी जी के पौत्र एवं दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार टी.एस. संधू ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

दिग्गजों का जमावड़ा

श्रद्धांजलि समारोह में देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की धर्मपत्नी श्रीमती गुरशरण कौर और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता विशेष रूप से उपस्थित रहीं। दिल्ली के उपराज्यपाल और सरदार समुंदरी के पौत्र, टी.एस. संधू ने अपने दादा को याद करते हुए उनके आदर्शों को राष्ट्र के लिए प्रेरणादायक बताया। समारोह में पद्मश्री भाई हरजिंदर सिंह (श्रीनगर वाले) के शबद कीर्तन से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो उठा।

इतिहास के पन्नों में दर्ज संघर्ष

17 जुलाई 1926 को लाहौर जेल में शहादत देने वाले सरदार तेजा सिंह समुंदरी का नाम सिख इतिहास में निस्वार्थ सेवा और दृढ़ता के प्रतीक के रूप में दर्ज है। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक गुरुद्वारों को कुप्रबंधन से मुक्त कराने में उनकी भूमिका मील का पत्थर साबित हुई। गुरु का बाग मोर्चा हो या चाबियाँ मोर्चा, हर संघर्ष में उन्होंने सिखों के साथ-साथ हिंदू समाज को अहिंसक आंदोलन के लिए एकजुट किया।

सरदार समुंदरी का विजन केवल धार्मिक सुधारों तक सीमित नहीं था। वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक भी थे। अमृतसर और तरनतारन के गांवों में उन्होंने दलित समाज को समानता का अधिकार दिलाने के लिए जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। सार्वजनिक कुओं से पानी भरने का अधिकार दिलाना हो या शिक्षा के माध्यम से युवाओं को सशक्त बनाना—वर्ष 1917 में लायलपुर और सरहाली में उन्होंने विद्यालयों की स्थापना कर आधुनिक सोच का परिचय दिया था।

उनके समकालीन नेताओं के अनुसार, वे एक ऐसे कुशल संगठनकर्ता थे जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी शांत और संयमित रहते थे। उनकी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यसमिति में शामिल होने का प्रस्ताव मिला था, और वे 'हिंदुस्तान टाइम्स' की स्थापना के शुरुआती प्रयासों में भी सक्रिय रहे थे।

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