Nifty Sensex Volatility and CAS : अगर आपने पिछले कुछ दिनों में शेयर बाजार पर नजर रखी होगी, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी। दिनभर सामान्य कारोबार के बाद बाजार बंद होते-होते निफ्टी और सेंसेक्स में अचानक बड़ा बदलाव दिखने लगा है। 3:30 बजे तक बाजार जहां दिख रहा था, क्लोजिंग के समय उसकी तस्वीर बदल गई।
इससे कई छोटे निवेशक हैरान रह गए और सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि क्या बाजार में कोई तकनीकी गड़बड़ी हुई है या फिर किसी ने आखिरी समय में बड़ी खरीदारी कर दी? हालांकि, इसके पीछे असल वजह कुछ और है। शेयर बाजार में Closing Auction Session (CAS) नाम का नया सिस्टम लागू हुआ है, जिसने बाजार की क्लोजिंग का तरीका ही बदल दिया है।
पहले कैसे तय होती थी क्लोजिंग?
मान लीजिए किसी शेयर का आखिरी सौदा शाम 3:30 बजे ₹100 पर हुआ। पहले यही ₹100 उस शेयर की आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस मानी जाती थी। यानी आखिरी सौदा ही क्लोजिंग प्राइस होता था।
अब क्या बदल गया?
अब बाजार बंद होने के बाद क्लोजिंग प्राइस तुरंत तय नहीं होती। ट्रेडिंग खत्म होने के बाद एक्सचेंज कुछ मिनट के लिए खरीदने और बेचने वाले ऑर्डर जमा करता है। फिर वह ऐसी कीमत तय करता है, जिस पर सबसे ज्यादा शेयरों की खरीद-बिक्री हो सके। इसी कीमत को उस शेयर की आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस माना जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को Closing Auction Session (CAS) कहा जाता है।
मान लीजिए किसी शेयर का आखिरी सौदा ₹100 पर हुआ। लेकिन, ऑक्शन के दौरान पता चलता है कि ₹101 पर 10 लाख शेयरों की खरीद-बिक्री हो सकती है। ₹100 पर सिर्फ 3 लाख शेयरों का सौदा संभव है। ऐसी स्थिति में एक्सचेंज ₹101 को उस शेयर की क्लोजिंग प्राइस मान लेगा। यानी आखिरी ट्रेड ₹100 पर हुआ, लेकिन आधिकारिक क्लोजिंग ₹101 होगी।
इससे निफ्टी और सेंसेक्स क्यों बदल जाते हैं?
निफ्टी और सेंसेक्स में 30 कंपनियां एक जैसी हैं। लेकिन, निफ्टी में 20 कंपनियां अलग हैं। आमतौर पर निफ्टी और सेंसेक्स एक डायरेक्शन में और फीसदी के हिसाब से देखें तो करीब बराबर ऊपर नीचे चलते दिखते हैं। लेकिन, अब इन इंडेक्स में शामिल कई कंपनियों की क्लोजिंग प्राइस ऑक्शन में बदल जाती है, तो पूरे इंडेक्स की क्लोजिंग भी बदल जाती है। यही वजह है कि हाल के दिनों में बाजार बंद होने के आखिरी मिनटों में निफ्टी और सेंसेक्स की क्लोजिंग प्राइस में बड़ा अंतर देखने को मिला।
आखिर यह बदलाव क्यों किया गया?
शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस बहुत अहम होती है। इसी के आधार पर निफ्टी और सेंसेक्स की क्लोजिंग तय होती है। इसके अलावा म्यूचुअल फंड की नेट एसेट वैल्यू (NAV) भी इसके आधार पर ही निकलती है। ETF की कीमत भी इससे ही तय होती है। कई डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स का सेटलमेंट भी इसके आधार पर होता है। बड़े विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशक अपने पोर्टफोलियो का मूल्यांकन भी इसके आधार पर करते हैं। पहले आशंका रहती थी कि बाजार बंद होने से ठीक पहले बड़ी खरीद या बिक्री करके क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित किया जा सकता है। नया सिस्टम इसी संभावना को कम करने के लिए लाया गया है।
