म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) में निवेश करना वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने और लंबी अवधि में संपत्ति बनाने का एक बेहतरीन जरिया है। ज्यादातर वित्तीय सलाहकार निवेशकों को 'बाय एंड होल्ड' यानी निवेश करने के बाद लंबे समय तक बने रहने की सलाह देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप निवेश करके उसे पूरी तरह भूल जाएं। बाजार के बदलते समीकरणों, फंड के प्रदर्शन और आपके निजी लक्ष्यों के आधार पर कई बार पोर्टफोलियो की समीक्षा करना और गलत फंड से बाहर निकलना भी बेहद जरूरी होता है। अगर आप समय रहते किसी खराब प्रदर्शन करने वाले या बदल चुके फंड से एग्जिट नहीं करते हैं, तो आपकी मेहनत की कमाई पर असर पड़ सकता है। आइए आपको बताते हैं वो 5 वार्निंग सिग्नल्स जिनको देखते ही आपको म्यूचुअल फंड से बाहर निकल जाना चाहिए।
म्यूचुअल फंड से कब बाहर निकलें?
फंड का लगातार खराब प्रदर्शन: अगर आपका म्यूचुअल फंड पिछले 2 से 3 तिमाहियों या एक-दो साल से अपने बेंचमार्क (जैसे Nifty 50) और अपनी ही कैटेगरी के दूसरे साथी फंड्स (Peer Funds) के मुकाबले लगातार खराब रिटर्न दे रहा है, तो यह एक बड़ा रेड फ्लैग है। बाजार में कभी-कभार गिरावट आना सामान्य है, लेकिन अगर बाजार में सुधार होने के बाद भी आपका फंड रिकवर नहीं कर पा रहा है, तो उससे बाहर निकलना ही समझदारी है।
फंड मैनेजर का बदलना या निवेश की शैली में बदलाव: किसी भी म्यूचुअल फंड की सफलता के पीछे उसके फंड मैनेजर की रणनीति और विजन का बड़ा हाथ होता है। यदि आपके पसंदीदा फंड का फंड मैनेजर बदल जाता है और नया मैनेजर उस फंड की मूल निवेश शैली (Investment Style) को बदल देता है, तो आपको फंड के प्रदर्शन पर पैनी नजर रखनी चाहिए। यदि नई रणनीति आपके जोखिम लेने की क्षमता से मेल नहीं खाती, तो आप एग्जिट कर सकते हैं।
लक्ष्य का पूरा हो जाना: म्यूचुअल फंड से निकलने का एक सबसे सही और सकारात्मक कारण होता है आपके वित्तीय लक्ष्य का पूरा होना। यदि आपने बच्चों की पढ़ाई, शादी या घर खरीदने के लिए 5 या 10 साल के लिए निवेश किया था और वह समय या टारगेट कॉर्पस (निश्चित रकम) हासिल हो चुका है, तो बाजार के जोखिम से बचने के लिए आपको तुरंत फंड बेचकर पैसा सुरक्षित कर लेना चाहिए।
फंड के आकार (AUM) का बहुत बड़ा या छोटा हो जाना: विशेषकर स्मॉल-कैप (Small-cap) और मिड-कैप फंड्स के मामलों में असेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) यानी फंड का कुल आकार बहुत बड़ा हो जाने पर फंड मैनेजर के लिए बेहतर शेयर चुनना और मनमुताबिक रिटर्न जेनरेट करना मुश्किल हो जाता है। दूसरी तरफ, यदि किसी फंड का एयूएम बहुत छोटा हो जाए और निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हों, तो भी फंड का खर्च (Expense Ratio) बढ़ जाता है, जो एक चेतावनी है।
एसेट एलोकेशन और पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग की जरूरत: समय के साथ बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण आपके पोर्टफोलियो का संतुलन बिगड़ सकता है। उदाहरण के लिए, यदि शेयर बाजार में तेजी के कारण आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी (Equity) का हिस्सा आपके तय किए गए 60% के स्तर से बढ़कर 80% हो गया है, तो आपका रिस्क बढ़ जाता है। ऐसे में पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने और एसेट एलोकेशन को वापस सही करने के लिए आपको इक्विटी फंड से कुछ पैसा निकालकर डेट (Debt) या सुरक्षित विकल्पों में डालना चाहिए।
इन बातों का रखें ध्यान
म्यूचुअल फंड से बाहर निकलते समय निवेशकों को कुछ तकनीकी और व्यावहारिक बातों का भी ध्यान रखना चाहिए। कभी भी बाजार की रोज-रोज की हलचल या शॉर्ट-टर्म के उतार-चढ़ाव को देखकर पैनिक (डर) में आकर अपनी एसआईपी (SIP) बंद न करें या फंड न बेचें। इसके अलावा, जब भी आप फंड से पैसा निकालें, तो एग्जिट लोड (Exit Load) और कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) की गणना जरूर कर लें, क्योंकि तय समय-सीमा से पहले निकलने पर आपको पेनाल्टी और शॉर्ट-टर्म टैक्स देना पड़ सकता है। अपने वित्तीय सलाहकार की मदद से साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की सेहत की जांच करें और इन 5 चेतावनियों के आधार पर सही समय पर सही निर्णय लें।
