जब भी कभी 'मिडिल ईस्ट' (Middle East) में वॉर की खबरें आती हैं, तो सबसे पहले भारत में पेट्रोल-डीजल और शेयर बाजार के दाम हिलने लगते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नक्शे पर एक छोटा सा हिस्सा दिखने वाला यह इलाका पूरी दुनिया की किस्मत कैसे तय करता है? लोग अक्सर 'मिडल ईस्ट' और 'खाड़ी देशों' (Gulf Countries) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन असल में इनके बीच एक बड़ा अंतर है। इस क्षेत्र को दुनिया का 'एनर्जी हब' कहा जाता है, और यही वजह है कि यहां चलने वाली एक भी गोली का शोर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में 'हाहाकार' मचा देता है। ऐसे में आइए आपको बताते हैं क्या है मिडिल ईस्ट और खाड़ी देश क्या हैं?
क्या है मिडिल ईस्ट?
मिडिल ईस्ट (Middle East) कोई एक देश नहीं, बल्कि तीन महाद्वीपों एशिया, अफ्रीका और यूरोप के मिलन स्थल पर स्थित देशों का एक समूह है। इसे 'मिडल ईस्ट' नाम पश्चिम के नजरिए से दिया गया था क्योंकि यह यूरोप के पूर्व में पड़ता है। इस क्षेत्र में लगभग 17-18 देश शामिल हैं, जिनमें तुर्की, ईरान, इराक, सऊदी अरब, इजरायल, जॉर्डन, सीरिया और मिस्र जैसे प्रमुख नाम हैं।
मिडिल ईस्ट सिर्फ तेल के लिए ही नहीं, बल्कि अपने इतिहास और धर्मों के लिए भी जाना जाता है। दुनिया के तीन बड़े धर्म इस्लाम, ईसाई और यहूदी की जड़ें इसी मिट्टी से जुड़ी हैं। इस क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत इतनी ज्यादा है कि यहां से गुजरने वाले समुद्री रास्ते पूरी दुनिया के व्यापार की लाइफलाइन हैं। यहां युद्ध छिड़ता है, तो केवल तेल ही नहीं, बल्कि अनाज से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामानों की सप्लाई चेन भी पूरी तरह टूट जाती है।
खाड़ी देश में कितने देश?
अब बात करते हैं खाड़ी देशों (Gulf Countries) की, जिन्हें अक्सर मिडिल ईस्ट का 'दिल' कहा जाता है। खाड़ी देश वे हैं जिनकी सीमा 'फारस की खाड़ी' (Persian Gulf) से लगती है। इनमें मुख्य रूप से 6 देश शामिल हैं जो 'गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल' (GCC) का हिस्सा हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन। इन देशों की सबसे बड़ी ताकत इनकी धरती के नीचे छिपा 'काला सोना' यानी कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस है।
दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इन्हीं देशों पर निर्भर है। खाड़ी देश अपनी बेहिसाब दौलत, आलीशान शहरों (जैसे दुबई और रियाद) और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जाने जाते हैं। यहां रहने वाले करोड़ों भारतीय प्रवासी न केवल इन देशों की तरक्की में हाथ बंटाते हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा (Remittance) भेजने का भी बड़ा जरिया हैं।

Gulf Countries
पूरी दुनिया में क्यों मचा है हाहाकार
पूरी दुनिया में मचे हाहाकार की असली वजह यह है कि मिडिल ईस्ट और खाड़ी देश ग्लोबल इकोनॉमी के 'पेट्रोल टैंक' हैं। जब भी ईरान या इजरायल जैसे देशों के बीच जंग छिड़ती है, तो 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसे समुद्री रास्तों के बंद होने का खतरा बढ़ जाता है। दुनिया का 20% से ज्यादा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। सप्लाई रुकने का डर पैदा होते ही कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं, जिससे भारत जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और यहां तक कि प्लास्टिक की बोतलें और अनाज भी महंगे हो जाते हैं। मिडिल ईस्ट की शांति में ही पूरी दुनिया की आर्थिक सलामती छिपी है।
मिडिल ईस्ट के पास कितना तेल?
दुनिया के नक्शे पर मिडिल ईस्ट वह इलाका है जिसे 'ग्लोबल एनर्जी का पावरहाउस' कहा जाता है, क्योंकि पूरी दुनिया के कुल कच्चे तेल के भंडार का लगभग 48% हिस्सा इसी क्षेत्र के देशों के पास सुरक्षित है। सऊदी अरब इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है, जिसके पास करीब 267 अरब बैरल तेल का विशाल भंडार है, जो वैश्विक हिस्सेदारी का लगभग 17% बैठता है। इसके बाद ईरान (208 अरब बैरल) और इराक (145 अरब बैरल) जैसे देश आते हैं, जिनकी जमीन के नीचे छिपा 'काला सोना' पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार तय करता है। यूएई और कुवैत जैसे छोटे देशों के पास भी दुनिया का लगभग 12% तेल मौजूद है, जो यह साबित करता है कि ऊर्जा सुरक्षा के मामले में यह पूरा क्षेत्र दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है।इन देशों की असली ताकत सिर्फ तेल का भंडार होना नहीं है, बल्कि यहाँ से तेल निकालना दुनिया के अन्य हिस्सों (जैसे अमेरिका या वेनेजुएला) के मुकाबले बहुत सस्ता पड़ता है क्योंकि यहाँ तेल जमीन की सतह के काफी करीब पाया जाता है। यही कारण है कि जब भी ईरान या सऊदी अरब जैसे देशों के बीच युद्ध या तनाव की स्थिति बनती है, तो पूरी दुनिया के शेयर बाजार और पेट्रोल पंपों पर हाहाकार मच जाता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25% हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संकरे रास्तों से होकर गुजरता है, जिस पर इन देशों का सीधा प्रभाव है। मिडिल ईस्ट के इन भंडारों में इतनी ताकत है कि अगर यहां सप्लाई में जरा सी भी रुकावट आए, तो विकसित देशों से लेकर भारत जैसे विकासशील देशों तक का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है।
समुद्र और जहाज ही नहीं ऐसे भी भारत में आ सकता है तेल
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अब सिर्फ समुद्री जहाजों और पोर्ट्स पर ही निर्भर नहीं रहता है बल्कि जमीन के नीचे बिछी हजारों किलोमीटर लंबी पाइपलाइन से सीधे गैस और तेल मंगाने की तैयारी में है। TAPI (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) नाम का यह बड़ा प्रोजेक्ट एक ऐसी 'अंडरग्राउंड' सड़क की तरह है, जो मध्य एशिया के तुर्कमेनिस्तान से शुरू होकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्तों से होती हुई सीधे भारत के पंजाब तक पहुंचेगी। इस पाइपलाइन के जरिए हर साल अरबों क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस भारत आएगी, जिससे न केवल बिजली और खाद बनाना सस्ता होगा, बल्कि जहाजों के जरिए आने वाले ईंधन पर होने वाला भारी खर्च भी बचेगा।यह प्रोजेक्ट भारत की 'एनर्जी सुरक्षा' के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है क्योंकि यह हमें समुद्र के जोखिमों और खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता से आजादी दिलाएगा। हालांकि, युद्ध और पड़ोसी देशों के साथ तनाव की वजह से इस रास्ते में कुछ सुरक्षा चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन चारों देश इस बात को समझते हैं कि यह पाइपलाइन पूरे क्षेत्र की तरक्की की चाबी है। एक बार पूरी तरह तैयार होने के बाद, यह पाइपलाइन भारत के घरों और फैक्ट्रियों तक बिना रुके सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा पहुंचाने का सबसे मजबूत जरिया बनेगी, जो यह साबित करता है कि अब भारत की तरक्की की रफ्तार जमीन के रास्ते भी तेज होने वाली है।
