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यूएस ट्रेड डील में 500 अरब डॉलर का ट्रेड टारगेट बाध्यता नहीं, भारत की एनर्जी ऑटोनॉमी रहेगी कायम : रिपोर्ट

भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क पर उठे सवालों के बीच वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया कि 500 अरब डॉलर का आंकड़ा बाध्यकारी नहीं है। रूस से तेल आयात, कृषि और घरेलू उद्योगों पर भी समझौते का कोई नकारात्मक असर नहीं होगा।

Piyush Goyal

पीयूष गोयल (इमेज क्रेडिट, x/@PiyushGoyal)

भारत-अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क को लेकर देश में राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज हो गई है। खासकर 500 अरब डॉलर के संभावित आयात लक्ष्य, रूस से तेल खरीद और कृषि क्षेत्र पर असर को लेकर सवाल उठे। हालांकि, ET की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने समझौते की बारीकियां स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह कोई बाध्यकारी समझौता नहीं, बल्कि व्यापारिक इरादे का ढांचा है, जिसमें भारत के रणनीतिक और आर्थिक हित पूरी तरह सुरक्षित हैं।

500 अरब डॉलर का आंकड़ा: लक्ष्य, मजबूरी नहीं

सरकार के मुताबिक 500 अरब डॉलर की खरीद को कई लोगों ने अनिवार्य आयात प्रतिबद्धता के रूप में समझ लिया, जबकि ऐसा नहीं है। गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी साल या अवधि में तय मात्रा में अमेरिकी सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं है। भारत आयात वही करेगा जहां कीमत, गुणवत्ता और मांग के हिसाब से सौदा फायदेमंद होगा। यह आंकड़ा भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और आने वाले वर्षों में बढ़ने वाली आयात जरूरतों के अनुमान पर आधारित है, न कि किसी कानूनी प्रतिबद्धता पर।

तेजी से बढ़ती औद्योगिक मांग का असर

भारत की स्टील उत्पादन क्षमता आने वाले वर्षों में लगभग दोगुनी होने की संभावना है, जिससे कोकिंग कोल जैसे कच्चे माल का आयात भी बढ़ेगा। इसी तरह नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पहले से ही अरबों डॉलर के विमान और इंजन ऑर्डर लंबित हैं। ऊर्जा क्षेत्र में भी तेल, LNG और LPG की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार से हाई-टेक आयात की जरूरत तेजी से बढ़ने वाली है। ऐसे में अमेरिका समेत कई देशों से आयात स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है।

रूसी तेल आयात पर कोई असर नहीं

समझौते को लेकर यह भी आशंका जताई जा रही थी कि भारत को रूस से तेल आयात कम करना पड़ सकता है। लेकिन सरकार ने इसे साफ तौर पर खारिज किया है। गोयल ने कहा कि तेल आयात का फैसला वाणिज्य मंत्रालय नहीं बल्कि संबंधित मंत्रालय और कंपनियां बाजार की स्थिति के आधार पर करती हैं। इसलिए इस समझौते का भारत की ऊर्जा रणनीति पर कोई प्रतिबंधात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

कृषि क्षेत्र और किसानों की सुरक्षा

कृषि क्षेत्र को लेकर भी चिंता जताई जा रही थी कि अमेरिकी उत्पाद भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। खासकर DDGS (पशु चारे में इस्तेमाल होने वाला उत्पाद) आयात को लेकर विवाद हुआ। सरकार का कहना है कि आयात की अनुमति बहुत सीमित कोटा में दी गई है, जबकि देश में पशु चारे की मांग तेजी से बढ़ रही है। पशुधन की बड़ी आबादी और घटती कृषि जमीन के कारण अतिरिक्त प्रोटीन फीड की जरूरत है। सरकार का दावा है कि डेयरी और प्रमुख कृषि उत्पादों को पूरी तरह संरक्षित रखा गया है और किसानों के हितों से समझौता नहीं किया गया।

आयात और प्रतिस्पर्धा का संतुलन

भारत पहले से ही सोयाबीन तेल, मेवे, फल और कुछ प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों का आयात करता रहा है। सरकार का तर्क है कि जहां घरेलू आपूर्ति पर्याप्त नहीं है, वहां नियंत्रित आयात उपभोक्ताओं को बेहतर कीमत और गुणवत्ता दिलाता है। इसलिए आयात को खतरे के रूप में देखने की बजाय, इसे संतुलित आर्थिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

डर से ज्यादा अहम है समझौते की बारीकियां

सरकार के अनुसार भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क किसी बाध्यकारी समझौते की बजाय एक लचीला व्यापारिक ढांचा है। इसमें भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता, कृषि हित और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। अब देखना यह होगा कि सरकार की यह व्याख्या आलोचकों और उद्योग जगत की चिंताओं को कितना शांत कर पाती है, लेकिन फिलहाल सरकार का रुख साफ है समझौता अवसर का है, दबाव का नहीं।

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