US Fed Rate Cut: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ टकराव के बाद फेडरल रिजर्व ने आर्थिक मंदी को रोकने के साथ-साथ महंगाई दर को रोकने के लिए संतुलन बनाते हुए अपनी ब्याज दर में एक चौथाई प्रतिशत (0.25%) की कटौती की। इस कटौती की घोषणा करते हुए, जिससे बेंचमार्क ब्याज दर 4 प्रतिशत से 4.25 प्रतिशत के दायरे में आ गई, फेड ने संकेत दिया कि इस साल दो और कटौती हो सकती हैं। यह फैसला ग्लोबल इकोनॉमिक इंडिकेटर्स और अमेरिका में मंदी की आशंका के मद्देनजर लिया गया है। अब सवाल उठता है कि इस कदम का भारतीय शेयर बाजार, बॉन्ड मार्केट और रुपये की कीमत पर क्या असर पड़ेगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
गौर हो कि फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने दिसंबर में पिछली ब्याज दर कटौती के बाद से ब्याज दर को स्थिर रखा था क्योंकि उन्हें महंगाई दर के फिर से बढ़ने का डर था, लेकिन नौकरियों में धीमी वृद्धि ने उन्हें निराश कर दिया। उन्होंने अब तक ट्रंप द्वारा ब्याज दर में कटौती के बार-बार आह्वान और उन्हें नौकरी से निकालने की धमकियों का विरोध किया था। पॉवेल ने मीडिया से कहा कि आमतौर पर, जब श्रम बाजार कमजोर होता है, तो महंगाई कम होती है। लेकिन अभी, हम कमजोर विकास और उच्च महंगाई दर के दोहरे जोखिम का सामना कर रहे हैं। कोई जोखिम-मुक्त रास्ता नहीं है। उन्होंने कहा कि यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है।
क्यों अहम है यूएस फेड का फैसला?
US Federal Reserve द्वारा की गई किसी भी नीति बदलाव का असर सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया भर की फाइनेंशियल मार्केट्स पर इसका प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की ब्याज दरें दुनिया के निवेशकों के फैसलों को प्रभावित करती हैं। जब अमेरिका में ब्याज दरें घटती हैं, तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि वहां उच्च रिटर्न की संभावना होती है।
भारतीय शेयर बाजार पर असर
US Fed की ब्याज दरों में कटौती का सकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार पर देखने को मिल सकता है। इसकी वजह है कि जब अमेरिका में दरें कम होती हैं, तो विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी मार्केट में ज्यादा निवेश करते हैं। इससे FII (Foreign Institutional Investors) की आमद बढ़ सकती है, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी में तेजी आने की संभावना रहती है। इसके अलावा ग्लोबल मार्केट में जो राहत का माहौल बनता है, वह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी सकारात्मक होता है।
भारतीय रुपये पर प्रभाव
अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती का सीधा असर डॉलर की मजबूती में कमी के रूप में देखा जा सकता है। इससे भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हो सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि अन्य ग्लोबल फैक्टर्स जैसे क्रूड ऑयल की कीमतें, भारत का ट्रेड डेफिसिट और विदेशी निवेश की स्थिति क्या है। अगर अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है और भारत में FII की आवक बढ़ती है, तो रुपया स्थिर या मजबूत हो सकता है, जिससे भारत के आयातकों को राहत मिलेगी।
भारत के बॉन्ड मार्केट पर असर
अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती का अप्रत्यक्ष असर भारत की बॉन्ड यील्ड्स पर भी पड़ सकता है। भारत सरकार के बॉन्ड्स विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जिससे उनकी डिमांड बढ़ेगी और यील्ड्स नीचे आ सकती हैं। इससे भारत में भी रेट कट की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो सकती है।
अमेरिका में बेरोजगारी और महंगाई दर
अमेरिका में बेरोजगारी दर करीब 4.3 प्रतिशत बनी हुई है, लेकिन रोजगार वृद्धि मई में 1,39,000 की मासिक वृद्धि से घटकर पिछले महीने 22,000 रह गई है। अगस्त में महंगाई दर बढ़कर 2.9 प्रतिशत हो गई, जो जुलाई से 0.2 प्रतिशत अधिक है। पॉवेल ने कहा कि आव्रजन प्रतिबंधों के कारण रोजगार वृद्धि धीमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि श्रमिकों की आपूर्ति में बहुत कम वृद्धि हुई है, अगर हुई भी है तो। साथ ही, श्रमिकों की मांग में भी काफी तेजी से गिरावट आई है। पॉवेल ने कहा कि उन्हें टैरिफ से महंगाई दर पर कुछ महीने पहले की अपेक्षा कम प्रभाव की उम्मीद है, और यह प्रभाव धीमा और अल्पकालिक हो सकता है।
