किरायेदार-मकान मालिक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला (तस्वीर-istock/PTI)
Landlord-Tenant Dispute : सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी मकान या दुकान में किरायेदार के रूप में वैध किराया समझौते (Rent Deed) के तहत दाखिल हुआ है और लंबे समय तक नियमित रूप से किराया देता रहा है, तो वह बाद में मकान मालिक की मालिकी पर सवाल नहीं उठा सकता। कोर्ट ने कहा कि किरायेदार को उसी व्यक्ति की मालिकाना स्थिति स्वीकार करनी होगी, जिसके साथ उसने किरायेदारी का कॉन्ट्रैक्ट किया था और जिसे वह वर्षों तक किराया देता रहा है। मालिक के स्वामित्व को चुनौती देना न्यायसंगत नहीं माना जाएगा, क्योंकि ऐसा करना ‘एस्टॉपल’ (Estoppel) के सिद्धांत के खिलाफ है यानी, कोई व्यक्ति उस बात से मुकर नहीं सकता जिसे उसने पहले मान लिया और जिसके आधार पर उसने लाभ उठाया। यह फैसला अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जो लंबे समय से चल रहे किरायेदारी विवादों में मकान मालिकों के अधिकार को मजबूत करता है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला 1953 से चला आ रहा था, जिसमें मकान मालिक और किरायेदार के उत्तराधिकारी आपस में लड़ रहे थे। दुकान रामजी दास नाम के व्यक्ति ने किराए पर दी थी। किरायेदार और उसके बेटे कई दशकों तक रामजी दास और उनके बेटे को किराया देते रहे।
रामजी दास की बहू ने अदालत में केस दायर किया कि दुकान की उन्हें जरूरत है अपने परिवार के मिठाई और नमकीन के व्यवसाय को बढ़ाने के लिए, जो पास की दुकान में चल रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें दुकान रामजी दास की वसीयत (Will) के जरिए मिली है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक किरायेदारों (मूल किरायेदार के बेटे) ने कहा कि यह वसीयत झूठी और फर्जी है और यह संपत्ति तो रामजी दास की नहीं, बल्कि उनके चाचा सुआ लाल की थी। निचली अदालतों ने किरायेदारों के पक्ष में फैसला दिया। ट्रायल कोर्ट, अपील कोर्ट और हाई कोर्ट तीनों ने कहा कि वादी (बहू) मालिकाना हक साबित नहीं कर पाई। वसीयत संदिग्ध लगती है। इसलिए, मकान मालिक की तरफ से मांगी गई निकासी (Eviction) को खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के निष्कर्ष गलत और सबूतों के विपरीत हैं। 1953 का त्यागपत्र (Exhibit P-18), जिसमें सुआ लाल ने संपत्ति रामजी दास को सौंपी थी, यह साबित करता है कि रामजी दास ही असली मालिक थे। किरायेदार और उसका परिवार 1953 से लगातार किराया देते रहे, इसलिए अब वे मालिकाना हक पर सवाल नहीं उठा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2018 में वसीयत को प्रोबेट (कानूनी मान्यता) मिल चुकी थी, इसलिए उसकी वैधता पर शक नहीं किया जा सकता। यह तर्क कि वसीयत में पत्नी का नाम नहीं है, संदेह का वैध कारण नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बहू और उसका परिवार पास की दुकान में मिठाई-नमकीन का काम करता है और उसी को विस्तारित करने की सच्ची जरुरत (Bona fide requirement) है।
किरायेदारों को दुकान खाली करने का आदेश दिया गया। जनवरी 2000 से किराया बकाया भी चुकाना होगा। 6 महीने का समय दिया गया दुकान खाली करने के लिए, लेकिन शर्त यह है कि दो हफ्ते के अंदर किरायेदार एक लिखित वचन (undertaking) दें, एक महीने में सारा बकाया किराया चुकाएं और छह महीने में दुकान खाली करें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो मकान मालकिन तुरंत बेदखली (summary eviction) की कार्रवाई करा सकती हैं।