Monsoon Trend and Food Inflation : देश के कई हिस्सों में कमजोर मानसून का असर अब खेतों तक पहुंचता दिख रहा है। केंद्र सरकार ने 4 अगस्त को संसद में बताया कि कम मानसून की वजह से इस साल देश में खरीफ की बुवाई में कमी आई है। अगर यही ट्रेंड अंतिम नतीजों में बदलता है, जो यह फूड इन्फ्लेशन के लिहाज से मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की तरफ से कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि 13 जुलाई, 2026 तक पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 38.82 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि फिलहाल बुवाई अभी जारी है। अंतिम तस्वीर आना बाकी है। लेकिन, यदि यह अंतर बना रहता है तो दाल, चावल और खाद्य तेल जैसी जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
उत्तर भारत में सामान्य से काफी कम बारिश
लोकसभा में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बताया कि 1 जून से 29 जुलाई, 2026 के बीच पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में सामान्य से कम बारिश हुई। पंजाब में सामान्य से 33% कम बारिश हुई है। इसी तरह हरियाणा में 26% की कमी दर्ज की गई है। वहीं, उत्तर प्रदेश में 24% और राजस्थान में 16% की कमी देखने को मिली है।
खरीफ की बुवाई कितनी घटी?
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक कम बारिश का असर जमीन पर दिखा है। 13 जुलाई तक देश में कुल 787.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई। जबकि, पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 826.19 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार 38.82 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई है। हालांकि मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि खरीफ सीजन की बुवाई अभी जारी थी और उस समय तक कुल बुवाई पिछले साल की तुलना में लगभग 5% कम थी।
क्या महंगे हो सकते हैं दाल-चावल?
सरकारी जवाब में महंगाई या कीमतों को लेकर कोई अनुमान नहीं दिया गया है। लेकिन, कृषि क्षेत्र के सामान्य आर्थिक प्रभावों के आधार पर यदि कम बुवाई आगे भी बनी रहती है और उत्पादन प्रभावित होता है, तो इसका असर बाजार पर पड़ सकता है। खासतौर पर धान की कम बुवाई से चावल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा दलहन और तिलहन का रकबा घटने पर दाल और खाद्य तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। अगर रकबा घटा, तो दाल और चावल का महंगा होना तय माना जा सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगस्त और सितंबर में मानसून कैसा रहता है, बुवाई कितनी बढ़ती है और प्रति हेक्टेयर उत्पादन कितना होता है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा कमी?
बुवाई के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक गिरावट महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक में दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में 15.70 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। वहीं, राजस्थान में 15.46 लाख हेक्टेयर कम बुवाई हुई है। इसी तरह कर्नाटक में 13.41 लाख हेक्टेयर, गुजरात में 6.31 लाख हेक्टेयर और मध्य प्रदेश में 4.94 लाख हेक्टेयर कमी आई है। वहीं, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम जैसे राज्यों में पिछले साल की तुलना में अधिक क्षेत्र में बुवाई हुई है।
सरकार क्या कर रही है?
कृषि मंत्रालय ने बताया कि भारतीय मौसम विभाग, ICAR, केंद्रीय जल आयोग और राज्य सरकारों के साथ मिलकर मानसून की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। राज्यों को कम अवधि वाली फसलों के बीज उपलब्ध कराने, बीज भंडार सक्रिय करने और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक फसल योजना लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा 342 जिलों के लिए कृषि आकस्मिक योजनाएं भी अपडेट की गई हैं।
राहत और मुआवजे पर क्या कहा?
सरकार ने संसद में कहा कि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत देना राज्य सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए राज्यों को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष से सहायता मिलती है और गंभीर परिस्थितियों में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी दी जा सकती है। हालांकि यह सहायता राहत के लिए होती है, फसल नुकसान के मुआवजे के रूप में नहीं।
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