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LPG Supply: अगले 4 साल तक ऐसी ही होती रहेगी गैस की दिक्कत, सरकारी अधिकारी ने ऐसा क्यों कहा?

एलपीजी सप्लाई बहाल होने में 3-4 साल लग सकते हैं, क्योंकि उत्पादन बाधित होने या क्षति के बारे में स्पष्टता नहीं है। भारत अपनी 60% एलपीजी आयात करता है, जिसमें पश्चिमी एशिया की बड़ी हिस्सेदारी है।

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LPG Cylinder

LPG Crisis: भारत में रसोई गैस (LPG) का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों परिवारों के लिए आने वाला समय चुनौतियों भरा हो सकता है। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और तनाव ने न केवल वैश्विक शांति को खतरे में डाला है, बल्कि भारत की रसोई तक पहुंचने वाली गैस की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा दिया है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हालिया बयान ने चिंता और बढ़ा दी है, जिसमें कहा गया है कि वैश्विक LPG सप्लाई चेन को पूरी तरह पटरी पर लौटने में कम से कम 3 से 4 साल का समय लग सकता है। यह संकट इतना गहरा है कि अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि खाड़ी देशों में उत्पादन केवल अस्थायी रूप से रुका है या वहां के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को कोई स्थायी नुकसान पहुंचा है।

सप्लाई बहाल होने में इतनी देरी क्यों?

आपूर्ति में इस बड़ी रुकावट के पीछे कई जटिल कारण हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, अभी यह अनिश्चित है कि युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में तेल के कुएं सुरक्षित हैं या नहीं। विदेशी सप्लायर्स से मिल रहे संकेतों की मानें तो सप्लाई चेन को फिर से व्यवस्थित करने में कम से कम 3 साल और उससे ज्यादा का समय लग सकता है। विशेष रूप से ईरान द्वारा सऊदी अरब और यूएई (UAE) के ऊर्जा ठिकानों पर किए गए हमलों ने गैस उत्पादन और जहाजों पर लोडिंग की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। जब तक ये ठिकाने दोबारा पूरी क्षमता से काम करना शुरू नहीं करते, तब तक दुनिया भर में गैस की किल्लत बनी रहेगी।

आयात पर टिकी है सप्लाई

भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि हम अपनी जरूरत का लगभग 60% LPG आयात करते हैं। युद्ध से पहले भारत की 90% गैस सप्लाई 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) के रास्ते आती थी, जो वर्तमान में सबसे ज्यादा संवेदनशील इलाका बना हुआ है। मार्च 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार, खाड़ी देशों से होने वाले आयात में बड़ी गिरावट आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत वैकल्पिक रास्ते तलाश भी लेता है, तो भी आपूर्ति में 40-50% की कमी बनी रह सकती है, जिसे पूरा करना आसान नहीं होगा।

बढ़ती कीमतें और कम होता स्टॉक

भारत की सालाना LPG डिमांड करीब 3.3 करोड़ टन है, लेकिन हमारे पास भंडारण (Storage) की क्षमता बहुत सीमित है। मार्च के मध्य तक देश के पास केवल 15 दिनों का स्टॉक बचा था। कम स्टॉक और सप्लाई में अनिश्चितता का सीधा असर कीमतों पर दिख रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में घरेलू गैस सिलेंडर के दाम ₹60 और कमर्शियल सिलेंडर के दाम ₹115 तक बढ़ चुके हैं। इस बढ़ती कीमत का बोझ न केवल आम जनता की जेब पर पड़ रहा है, बल्कि सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) पर भी सब्सिडी का भारी आर्थिक दबाव बढ़ गया है।

किन देशों पर निर्भर है भारत?

भारत अपनी LPG जरूरत के लिए मुख्य रूप से छह देशों पर निर्भर है, जिनमें UAE और कतर सबसे बड़े नाम हैं। भारत के कुल आयात में UAE की 41% और कतर की 22% हिस्सेदारी है। चूंकि ईरान के हमलों का सबसे ज्यादा असर UAE के ऊर्जा ठिकानों पर पड़ा है, इसलिए भारत के लिए जोखिम कई गुना बढ़ गया है। सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और ओमान जैसे देश भी भारत को गैस सप्लाई करते हैं, लेकिन युद्ध की आग ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे सप्लाई का सुरक्षित रहना मुश्किल हो गया है।

आम आदमी और छोटे कारोबारियों पर मार

सप्लाई चेन में आई इस बाधा का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं है। होटल, रेस्टोरेंट और एमएसएमई (MSME) सेक्टर, जो भारी मात्रा में कमर्शियल गैस का उपयोग करते हैं, उनकी लागत अचानक बढ़ गई है। इससे बाहर का खाना और कई अन्य उत्पाद महंगे हो सकते हैं। सरकार हालांकि घरेलू उत्पादन बढ़ाने और नए देशों से आयात के विकल्प तलाश रही है, लेकिन 3-4 साल की यह लंबी अवधि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक कठिन परीक्षा साबित होने वाली है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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