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Explainer: गिग इकोनॉमी क्या है? भारत के लिए क्यों जरूरी

Gig Economy Explained: भारत में गिग इकोनॉमी रोजगार के नए अवसर दे रही है। युवाओं और महिलाओं को लचीलापन मिलता है, लेकिन आय की अनिश्चितता और सामाजिक सुरक्षा जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। आइए विस्तार से समझें?

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गिग इकोनॉमी: नौकरी का नया मॉडल या कमाई की नई मजबूरी? (तस्वीर-AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Sep 5, 2026, 15:17 IST
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Gig Economy Explained : आज के समय में नौकरी करने का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले ज्यादातर लोग किसी कंपनी या संस्था में नियमित नौकरी करते थे। उन्हें हर महीने तय वेतन मिलता था। काम के घंटे भी तय होते थे। लेकिन अब काम का एक नया तरीका तेजी से बढ़ रहा है। इसे गिग इकोनॉमी कहा जाता है। गिग इकोनॉमी में लोग किसी एक कंपनी की स्थायी नौकरी नहीं करते। वे अपनी जरुरत के हिसाब से अलग-अलग काम करते हैं। उन्हें काम पूरा करने के बदले पैसे मिलते हैं। यह काम कुछ घंटे, कुछ दिन या किसी प्रोजेक्ट तक हो सकता है।

गिग इकोनॉमी क्या है?

गिग इकोनॉमी ऐसे रोजगार बाजार को कहते हैं, जहां लोग स्थायी नौकरी के बजाय छोटे-छोटे काम करते हैं। इन कामों को आम तौर पर 'गिग' कहा जाता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपनी कार चलाकर लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है। कोई व्यक्ति खाना घर तक पहुंचाता है। कोई घर की सफाई या मरम्मत का काम करता है। कोई ऑनलाइन पढ़ाता है। कोई फ्रीलांस लेखन या डिजाइन का काम करता है। इन सभी कामों में व्यक्ति को हर महीने एक तय वेतन मिलना जरूरी नहीं है। उसे काम के हिसाब से भुगतान किया जाता है।

गिग वर्क और प्लेटफॉर्म वर्क में क्या अंतर है?

गिग वर्क एक बड़ी श्रेणी है। इसमें कई तरह के अस्थायी और काम आधारित रोजगार शामिल होते हैं। जैसे फ्रीलांस लेखक, फोटोग्राफर, ट्यूटर, सलाहकार और टैकनीशियन। ये लोग बिना किसी स्थायी नौकरी के अलग-अलग ग्राहकों के लिए काम कर सकते हैं। प्लेटफॉर्म वर्क इसका एक हिस्सा है। इसमें काम किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म या मोबाइल ऐप के जरिए मिलता है। उदाहरण के लिए Uber, Ola और Rapido के ड्राइवर। Swiggy, Zomato, Blinkit और Zepto के डिलीवरी पार्टनर। Urban Company से जुड़े सेवा पेशेवर भी इसका उदाहरण हैं। यानी हर प्लेटफॉर्म वर्कर गिग वर्कर है। लेकिन हर गिग वर्कर प्लेटफॉर्म से नहीं जुड़ा होता।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है गिग इकोनॉमी?

भारत में हर साल बड़ी संख्या में युवा नौकरी की तलाश में आते हैं। सभी लोगों को नियमित नौकरी मिलना आसान नहीं है। ऐसे में गिग इकोनॉमी रोजगार का एक नया रास्ता देती है। आर्थिक सर्वे 2023-24 के अनुसार भारत को वर्ष 2030 तक हर साल करीब 78.5 लाख गैर-कृषि रोजगार पैदा करने की जरुरत होगी। गिग वर्क इस चुनौती को कम करने में मदद कर सकता है। इसमें कई कामों के लिए बहुत ज्यादा औपचारिक योग्यता जरूरी नहीं होती। युवा अपने वाहन, मोबाइल फोन या किसी खास हुनर की मदद से कमाई शुरू कर सकते हैं।

महिलाओं के लिए भी बन रहा है अवसर

गिग इकोनॉमी महिलाओं के लिए भी रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकती है। कई महिलाएं परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण नियमित नौकरी नहीं कर पातीं। गिग वर्क में काम के समय को लेकर कुछ लचीलापन मिलता है। ऑनलाइन ट्यूशन, कंटेंट क्रिएशन और टेलीकंसल्टेशन जैसे काम घर से भी किए जा सकते हैं। 'डिकोडेड: भारत में महिलाएं और डिजिटल कार्य का भविष्य' रिपोर्ट के अनुसार गिग वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 28 प्रतिशत है। इससे पता चलता है कि महिलाएं भी इस नए रोजगार बाजार का हिस्सा बन रही हैं।

डिजिटल इंडिया को भी मिलती है ताकत

गिग इकोनॉमी और डिजिटल तकनीक का गहरा संबंध है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, डिजिटल पहचान, GPS और ऑनलाइन पेमेंट ने इस काम को आसान बनाया है। अब ग्राहक ऐप पर काम बुक कर सकता है। कर्मचारी उसी ऐप पर काम देख सकता है। भुगतान भी डिजिटल तरीके से हो सकता है। UPI ने इस व्यवस्था को और आसान बनाया है। जुलाई 2026 में UPI ने करीब 30 लाख करोड़ रुपये के करीब 23 अरब लेन-देन प्रोसेस किए। इससे ड्राइवरों, डिलीवरी पार्टनरों और छोटे सर्विस प्रोवाइडर को तेजी से भुगतान मिलने में मदद मिली।

ई-कॉमर्स के लिए क्यों जरूरी हैं गिग वर्कर?

आज लोग घर बैठे सामान मंगाते हैं। खाना भी ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं। दवाइयां और रोजमर्रा का सामान भी ऐप से मंगाया जा सकता है। लेकिन सामान को ग्राहक के घर तक पहुंचाने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की जरुरत होती है। यहीं गिग वर्कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Amazon, Flipkart, Swiggy, Zomato, Blinkit और Zepto जैसी कंपनियों की डिलीवरी व्यवस्था में ऐसे कर्मचारी बड़ी भूमिका निभाते हैं। कोविड-19 के दौरान इनकी भूमिका और साफ दिखाई दी। लॉकडाउन में डिलीवरी कर्मियों ने लोगों तक खाना, दवाइयां और जरूरी सामान पहुंचाया।

छोटे कारोबारों को भी फायदा

गिग इकोनॉमी से छोटे कारोबारों को भी मदद मिलती है। हर छोटा व्यापारी अलग से डिलीवरी कर्मचारी नहीं रख सकता। हर कंपनी के लिए वेबसाइट बनाने या अकाउंट संभालने के लिए स्थायी कर्मचारी रखना भी महंगा हो सकता है। ऐसे में गिग वर्कर मदद करते हैं। वे डिलीवरी, मार्केटिंग, अकाउंटिंग, वेबसाइट बनाने और ग्राहक सेवा जैसे काम कर सकते हैं। इससे छोटे कारोबार कम खर्च में ज्यादा ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं।

लोगों को उद्यमी बनने का मौका

गिग इकोनॉमी केवल नौकरी का विकल्प नहीं है। यह लोगों को खुद कमाने का मौका भी देती है। जिस व्यक्ति के पास कार है, वह उसे कमाई का साधन बना सकता है। जिसके पास तकनीकी हुनर है, वह ग्राहकों को अपनी सेवा दे सकता है। पोर्टर जैसे प्लेटफॉर्म वाहन मालिकों को सामान पहुंचाने वाले काम से जोड़ते हैं। अर्बन कंपनी जैसे प्लेटफॉर्म कुशल कामगारों को ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। इस तरह व्यक्ति अपने हुनर और संपत्ति का इस्तेमाल करके कमाई कर सकता है।

गिग इकोनॉमी: युवाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता या अस्थिर कमाई का खेल? (तस्वीर-AI)

गिग इकोनॉमी: युवाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता या अस्थिर कमाई का खेल? (तस्वीर-AI)

गिग इकोनॉमी की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

इसकी सबसे बड़ी खासियत है लचीलापन। कई मामलों में कर्मचारी तय कर सकता है कि उसे कब काम करना है। वह कितने घंटे काम करना चाहता है, यह भी तय कर सकता है। एक व्यक्ति एक साथ कई प्लेटफॉर्म के लिए भी काम कर सकता है। उदाहरण के लिए कोई ड्राइवर Ola और Uber दोनों से काम ले सकता है। लेकिन यह लचीलापन पूरी तरह स्वतंत्र भी नहीं होता। ऐप के नियम, प्रोत्साहन और एल्गोरिदम उसके काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं।

एल्गोरिदम कैसे करता है काम?

गिग इकोनॉमी में कर्मचारी के काम को अक्सर डिजिटल सिस्टम नियंत्रित करता है। ऐप यह तय कर सकता है कि किस कर्मचारी को कौन सा काम मिलेगा। ग्राहक की रेटिंग भी महत्वपूर्ण हो सकती है। किसी कर्मचारी को ज्यादा काम मिल सकता है। किसी को कम काम मिल सकता है। कई बार उसका अकाउंट भी निलंबित हो सकता है। इसे एल्गोरिदम आधारित प्रबंधन कहा जाता है। यही व्यवस्था गिग वर्करों के लिए चिंता का कारण भी बन रही है। कई बार कर्मचारी को यह साफ पता नहीं होता कि उसे काम क्यों नहीं मिल रहा है या उसका अकाउंट क्यों बंद किया गया।

गिग वर्करों के सामने क्या चुनौतियां हैं?

गिग इकोनॉमी के कई फायदे हैं। लेकिन इसके सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या आय की अनिश्चितता है। काम ज्यादा मिलने पर कमाई बढ़ सकती है। काम कम मिलने पर आय भी घट सकती है। दूसरी समस्या सामाजिक सुरक्षा की है। नियमित नौकरी करने वाले कर्मचारियों को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं। गिग वर्करों के लिए यह व्यवस्था अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है। इसके अलावा पेट्रोल, वाहन की मरम्मत, मोबाइल और दूसरे खर्च भी कई बार कर्मचारी को खुद उठाने पड़ते हैं। अकाउंट निलंबित होने का खतरा भी रहता है। इससे कर्मचारी की कमाई अचानक रुक सकती है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 क्या कहती है?

भारत ने गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों को कानूनी पहचान देने की दिशा में कदम उठाया है। सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 में गिग वर्कर और प्लेटफॉर्म वर्कर की परिभाषा शामिल की गई है। यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। लेकिन केवल कानून होना काफी नहीं है। गिग वर्करों को ऐसी सामाजिक सुरक्षा चाहिए, जो उनके साथ अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम करने के बावजूद जारी रहे। उन्हें स्वास्थ्य सुरक्षा, दुर्घटना सहायता और भविष्य के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसे लाभों की जरुरत है।

आगे क्या करने की जरुरत है?

गिग इकोनॉमी भारत में तेजी से बढ़ रही है। इसलिए इसके लिए मजबूत व्यवस्था भी जरूरी है। सबसे पहले गिग वर्करों का आसान पंजीकरण होना चाहिए। उनके सामाजिक सुरक्षा लाभ पोर्टेबल होने चाहिए। यानी कर्मचारी प्लेटफॉर्म बदलने पर भी लाभ न खोए। उचित भुगतान की व्यवस्था भी जरूरी है। काम से जुड़े खर्चों को ध्यान में रखकर पारिश्रमिक तय होना चाहिए। एल्गोरिदम से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता भी जरूरी है। अगर किसी कर्मचारी का अकाउंट बंद किया जाता है, तो उसे कारण बताने और अपील करने का मौका मिलना चाहिए।

गिग इकोनॉमी भारत के रोजगार बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। यह युवाओं, महिलाओं और छोटे कारोबारों के लिए नए अवसर पैदा करती है। डिजिटल तकनीक ने इसे तेजी से बढ़ाया है। इससे ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान को भी ताकत मिल रही है। लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी हैं। आय की अनिश्चितता, सामाजिक सुरक्षा की कमी और एल्गोरिदम पर ज्यादा निर्भरता बड़ी समस्याएं हैं। इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें रोजगार का लचीलापन भी बना रहे और गिग वर्करों के अधिकार भी सुरक्षित रहें। यही संतुलन गिग इकोनॉमी को लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बना सकता है।

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