ईरान संकट और कच्चे तेल की कीमत में तेजी से पेट्रोलियम कंपनियों को पेट्रोल एवं डीजल की बिक्री पर क्रमशः 14 रुपये एवं 18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि, इसके बावजूद कंपनियों ने इसका बोझ आम लोगों पर नहीं डाला है। ईरान युद्ध और होर्मुज बंद होने के बाद से दुनियाभर के कई देशों में ईंधन की कीमत बढ़ी है लेकिन भारत में नहीं बढ़ी है। अब आज बंगाल विधानसभा चुनाव खत्म हो रहा है तो एक बार फिर कयास लगाए जा रहे हैं कि कल से पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि सरकार की तेल की कीमत बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।
रेटिंग एजेंसी इक्रा ने क्या कहा?
रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार, तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल एवं डीजल की बिक्री पर क्रमशः 14 रुपये एवं 18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमत 120-125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बनी रहती है, तो पेट्रोलियम कंपनियों का विपणन मार्जिन आगे भी नकारात्मक बना रहेगा, जिससे कंपनियों की मुनाफा प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल के अलावा रसोई गैस (एलपीजी) पर भी भारी ’अंडर-रिकवरी’ यानी नुकसान होने की आशंका है, जो वित्त वर्ष 2026-27 में करीब 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
खाद सब्सिडी का भी बोझ बढ़ेगा
वहीं, इस अवधि में उर्वरक सब्सिडी बढ़कर 2.05 लाख करोड़ से 2.25 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच जाने का अनुमान है, जो 1.71 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान से काफी अधिक है। इक्रा ने कहा कि करीब 20 प्रतिशत वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति वाले समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधाओं के कारण ईंधन, उर्वरक और रसायनों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। इससे कीमतों में वृद्धि और तेल रिफाइनरी और विपणन कंपनियों पर लागत दबाव बढ़ा है।
70-72 डॉलर प्रति बैरल थी कच्चे तेल की कीमत
फरवरी अंत में पश्चिम एशिया संकट शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 70-72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थी, जो 110 डॉलर प्रति बैरल से अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऊर्जा और कच्चे माल की अधिक लागत का असर तेल विपणन, उर्वरक, रसायन और शहरी गैस वितरण क्षेत्रों की लाभप्रदता पर पड़ेगा, क्योंकि कंपनियां लागत का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं।
