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क्रूड की टेंशन खत्म! हवा से बनेगा 'डीजल-पेट्रोल' Japan की सबसे बड़ी एनर्जी कंपनी ने किया कमाल

पूरी दुनिया फिलहाल ईंधन संकट से जूझ रही है। अमेरिका और ईरान के युद्ध ने ग्लोबल ऑयल सप्लाई को बाधित कर दिया है। लेकिन, जापान ने हवा से डीजल-पेट्रोल निकालकर क्रूड की टेंशन का स्थायी समाधान तलाश लिया है।

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क्रूड संकट के बीच बड़ी कामयाबी

पहली बार में यह बात बेतुकी लगती है, लेकिन जापान की सबसे बड़ी एनर्जी कंपनी ENEOS ने इस तरह की तकनीक बना ली है, जिससे हवा से डीजल-पेट्रोल बनाया जा सकता है। जापान जैसे देश के लिए यह टेक्नोलॉजी बेहद अहम साबित हो सकती है। क्योंकि, जापान भी भारत की तरह ही ईंधन का नेट आयातक है और अपनी जरूरत का 90% तक ईंधन आयात करता है।

होर्मुज बंद होने की वजह से जापान सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है। जापान की सबसे बड़ी रिफाइनरी चलाने वाली ENEOS लंबे समय से क्रूड आयात से आजादी दिलाने वाले रिसर्च और एक्सपेरिमेंट कर रही है। कंपनी को इस मामले में बड़ी कामयाबी मिली है। ENEOS ने योकोहामा में दुनिया का पहला इंटीग्रेटेड सिंथेटिक फ्यूल डेमो प्लांट स्थापित किया है। इस प्लांट के जरिये हवा से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और पानी से हाइड्रोजन लेकर पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसा ईंधन बनाया जा रहा है।

कैसे काम करता है यह कमाल?

जापानी कंपनी ने हवा से ईंधन निकालने की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी की है। इसके तहत सबसे पहले Direct Air Capture (DAC) तकनीक से हवा में मौजूद CO₂ को अलग किया जाता है। इसके बाद सौर या पवन ऊर्जा से चलने वाले इलेक्ट्रोलाइजर की मदद से पानी को हाइड्रोजन में बदला जाता है। इन दोनों को Fischer-Tropsch संश्लेषण प्रक्रिया से जोड़कर ड्रॉप-इन हाइड्रोकार्बन ईंधन तैयार किया जाता है। यह ईंधन बिल्कुल पारंपरिक पेट्रोल-डीजल की तरह है, इसलिए मौजूदा इंजन, वाहन, पाइपलाइन या रिफाइनरी में कोई बदलाव नहीं करना पड़ता।

हर रोज बन रहा 1 बैरल ईंधन

जापानी कंपनी के इस प्लांट में फिलहाल हर दिन करीब 159 लीटर (1 बैरल) सिंथेटिक ईंधन बनाया जा रहा है। इस ईंधन को टोयोटा, हिनो समेत कई कंपनियों की गाड़ियों में टेस्ट किया जा चुका है। हाल में ही ओसाका एक्सपो के दौरान शटल बसों में भी इसका इस्तेमाल हुआ, जिसमें कुछ बसें 100% सिंथेटिक डीजल पर चलाई गईं।

दुनिया बदलने का दम

ENEOS की यह तकनीक दुनिया बदलने का दम रखती है। मिसाल के तौर पर भारत हर साल करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का क्रूड ऑयल आयात करता है। भारती की तरह ही जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और यूरोपीय देश भी भारी मात्रा में तेल आयात पर निर्भर हैं। अगर यह तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल होती है, तो क्रूड आयात पर निर्भरता कम कर सकते हैं। इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा बचती है, बल्कि कच्चे तेल की आपूर्ति में रुकावट आने पर भी ऊर्जा सुरक्षा बनी रहती है।

व्यावसायिक बनाने में मुश्किलें

भले तकनीक को लैब कंडीशन में कामयाबी मिल गई है। लेकिन, इसकी लागत के साथ ही ग्रीन हाइड्रोजन और DAC की ऊर्जा खपत बड़ी चुनौती है। अक्टूबर 2025 में ENEOS ने माना कि फिलहाल इसकी कमर्शियल स्केलिंग महंगी पड़ रही है, इसलिए आगे बढ़ाने पर रोक लगा दी गई है। हालांकि, डेमो प्लांट चल रहा है और रिसर्च जारी है। इसके साथ ही कंपनी को उम्मीद है कि सोलर और विंड पावर सस्ती होने, बैटरी और इलेक्ट्रोलाइजर टेक्नोलॉजी बेहतर होने के साथ सिंथेटिक ईंधन की कीमत भी घट सकती है।

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Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानिया author

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों... और देखें

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