जापान इस समय एक बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा है, और इसकी सबसे बड़ी वजह है देश का वह नियम जिसे ‘Zero Rule’ कहा जाता था। यह नियम लगभग 30 साल से जापान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी का काम कर रहा था। लेकिन जैसे ही इस नियम को हटाया गया, बाजारों में हलचल मच गई, ब्याज दरें बढ़ने लगीं, और पूरा आर्थिक सिस्टम दबाव में आ गया। आखिर क्या था यह ज़ीरो रूल और इसे हटते ही हालात कैसे बिगड़ गए?
जापान पिछले तीन दशकों से शून्य ब्याज दर (Zero Interest Rate Policy) पर चल रहा था। इस नियम के तहत बैंक लोन बेहद सस्ते में मिलते थे, क्योंकि ब्याज दर लगभग शून्य थी। इससे कंपनियों को निवेश करने में आसानी होती थी और सामान्य लोगों पर EMI का बोझ भी कम रहता था। यही वजह थी कि जापान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक कम ब्याज दरों के सहारे चलती रही। इस नियम के कारण आर्थिक गतिविधियाँ चलती रहीं और देश की ग्रोथ किसी न किसी तरह टिके रहने में सफल रही।
लेकिन सालों-साल शून्य ब्याज दर बनाए रखने का असर यह हुआ कि जापान में महंगाई बहुत कम रही और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सुस्त पड़ने लगी। बैंक भी ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पा रहे थे क्योंकि उन्हें लोन से कम कमाई हो रही थी। इतनी चुनौतियों के बीच जापान सरकार और बैंक ऑफ जापान ने आखिरकार इस ‘Zero Rule’ को खत्म करने का फैसला किया और ब्याज दरें बढ़ा दीं। बस इसी एक फैसले ने पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख दिया।
जैसे ही ब्याज दरों में बढ़ोतरी हुई, पूरे बाजार में हड़कंप मच गया। कंपनियों पर लोन का बोझ बढ़ने लगा, क्योंकि अब उन्हें अधिक ब्याज चुकाना पड़ रहा था। कई छोटे और मध्यम आकार के व्यवसाय, जो कम ब्याज दरों पर निर्भर थे, अचानक संकट में आ गए। लोगों की EMI भी बढ़ गई, जिससे आम जनता पर भी सीधा असर पड़ा। निवेशकों ने भी घबराकर अपने पैसे निकालने शुरू कर दिए, और शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई।
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ताजा रिपोर्टों के अनुसार, जापान की अर्थव्यवस्था एक अनिश्चित दौर में प्रवेश कर चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जापान ने एक ही झटके में अपनी 30 साल की ‘मनी मशीन’ को बंद कर दिया है। ज़ीरो रूल ने भले ही जापान को लंबे समय तक स्थिर रखा था, लेकिन इसे अचानक हटाने से संतुलन बिगड़ गया। नई ब्याज दर नीति के चलते देश की वित्तीय स्थिति दबाव में आ चुकी है और आने वाले महीनों में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।