Jaipur Rugs Success Story : निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे किसी व्यक्ति को अगर बैंक की आरामदायक सुरक्षित नौकरी मिल जाए, तो पूरा परिवार धन्य हो जाता है। लेकिन, नंद किशोर चौधरी ने साल 1978 में सपनों के इस जीवन को ठुकराते हुए संघर्ष का रास्ता चुना और फिर कामयाबी की ऐसी कहानी लिखी, जिसे आज Harvard Business School से लेकर IIM तक केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाता है।
नंद किशोर चौधरी चाहते, तो आराम से बैंक की नौकरी कर सकते थे। परिवार भी यही चाहता था कि बेटा सुरक्षित करियर चुने। लेकिन उन्होंने नौकरी के बजाय कारोबार का जोखिम उठाया। पिता से ₹5,000 उधार लिए, घर के आंगन में 2 करघे लगाए और 9 बुनकरों के साथ कालीन बनाने का काम शुरू किया। उस समय उन्होंने खुद भी नहीं सोचा होगा कि उनका यह छोटा कारोबार एक दिन दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित हस्तनिर्मित कालीन ब्रांडों में शामिल होगा।
घर-घर जाकर तलाशे बुनकर
राजस्थान के चूरू जिले से आने वाले नंद किशोर चौधरी ने शुरुआत में खुद गांव-गांव जाकर बुनकरों से मुलाकात की। उस दौर में कालीन उद्योग में बिचौलियों का दबदबा था। कारीगरों को उनकी मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिल पाता था। चौधरी ने इस व्यवस्था को बदलने का फैसला किया। उन्होंने बुनकरों से सीधे जुड़कर उन्हें काम देना शुरू किया। कंपनी ऊन, डिजाइन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराती, जबकि कारीगर अपने घरों में कालीन तैयार करते। इससे गांवों में रोजगार भी बढ़ा और कारीगरों की आय भी बेहतर हुई।
बिचौलियों बिना बड़ा बना Jaipur Rugs
बिचौलियों के बिना काम करना ही जयपुर रग्स की सबसे बड़ी ताकत बना। कंपनी ने बड़ी फैक्ट्रियां लगाने के बजाय गांवों को ही अपनी उत्पादन इकाई बनाया। इससे पारंपरिक भारतीय हस्तकला को बचाने के साथ-साथ हजारों परिवारों को अपने घर के पास ही रोजगार मिला। आज Jaipur Rugs से 600 से अधिक गांवों के 40,000 से ज्यादा कारीगर जुड़े हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है।
आज 60 देशों तक फैला कारोबार
शुरुआती वर्षों में कंपनी दूसरे निर्यातकों के जरिये कालीन विदेश भेजती थी, लेकिन बाद में उसने अपना ब्रांड तैयार किया। गुणवत्ता, अनोखे डिजाइन और हाथ से बुने कालीनों ने Jaipur Rugs को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान दिलाई। आज कंपनी के कालीन 60 से अधिक देशों में बिकते हैं और दुनिया के कई लग्जरी होटल, कॉरपोरेट ऑफिस तथा प्रीमियम घरों की शोभा बढ़ाते हैं।
भारत के हुनर को वैश्विक पहचान
Jaipur Rugs सिर्फ कालीन बेचने वाली कंपनी नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत के हुनर पहचान और वैश्विक बाजार से जोड़ने वाला बिजनेस मॉडल भी है। कंपनी की 'मंचाहा' पहल इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। इसमें बुनकर किसी तय डिजाइन की नकल नहीं करते, बल्कि अपनी कल्पना, जीवन के अनुभव और स्थानीय संस्कृति को कालीन पर उतारते हैं। इससे कारीगर सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि कलाकार के रूप में पहचान बना रहे हैं।
बिजनेस मॉडल में लोग अहम
आज Jaipur Rugs का नाम दुनिया के प्रमुख हस्तनिर्मित कालीन ब्रांडों में लिया जाता है। लेकिन नंद किशोर चौधरी मानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कारोबार का आकार नहीं, बल्कि हजारों बुनकर परिवारों की जिंदगी में आया बदलाव है। उनका मानना है कि अगर किसी बिजनेस मॉडल में लोगों का विकास शामिल नहीं है, तो उसकी सफलता अधूरी है।
उद्यमियों के लिए बड़ी सीख
Jaipur Rugs की कहानी नए उद्यमियों के लिए बड़ी सीख छोड़ती है। पहली, बड़ा कारोबार शुरू करने के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती। केस स्टडी के रूप में हावर्ड बिजनेस स्कूल (Harvard Business School - HBS) और दुनिया के अन्य शीर्ष मैनेजमेंट संस्थानों (जैसे IIMs और Wharton) में जयपुर रग्स की कहानी को "A Business with a Soul" के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा कंपनी का 'बॉटम ऑफ द पिरामिड' (Bottom of the Pyramid) का सफल मॉडल माना जाता है, जिसमें समाज के सबसे निचले और वंचित वर्ग को व्यापारिक तंत्र में शामिल करके समाज और व्यवसाय दोनों का विकास किया जा सकता है।
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