IT Stocks Crash : अमेरिकी आईटी दिग्गज कंपनी Accenture के तिमाही नतीजे आए और कुछ ही घंटों में भारत के आईटी शेयरों में भारी बिकवाली शुरू हो गई। TCS, Infosys, HCLTech, Wipro और Tech Mahindra जैसे दिग्गज शेयर टूट गए, जबकि Nifty IT इंडेक्स तीन साल के निचले स्तर तक फिसल गया। सवाल यह है कि आखिर अमेरिका की एक कंपनी के कमजोर संकेतों से भारत का पूरा आईटी सेक्टर क्यों हिल जाता है? इसका जवाब दोनों देशों के आईटी कारोबार के गहरे रिश्ते में छिपा है।
अमेरिका से जुड़ी नब्ज
भारतीय आईटी उद्योग का सबसे बड़ा ग्राहक अमेरिका है। TCS, Infosys, HCLTech, Wipro और Tech Mahindra जैसी कंपनियों के कुल कारोबार का 50% से 65% हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है। इनमें भी सबसे बड़े ग्राहक बैंक, बीमा कंपनियां, रिटेल चेन, हेल्थकेयर कंपनियां और टेक्नोलॉजी फर्म हैं। जब अमेरिकी कंपनियां खर्च बढ़ाती हैं, तो भारतीय आईटी कंपनियों को ज्यादा प्रोजेक्ट मिलते हैं। लेकिन, जब अमेरिका में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, ब्याज दरें ऊंची रहती हैं या कंपनियां लागत घटाने लगती हैं, तो सबसे पहले टेक्नोलॉजी बजट पर असर पड़ता है। यही असर भारतीय कंपनियों के ऑर्डर बुक में दिखाई देता है।
Accenture सेक्टर का थर्मामीटर?
Accenture को अक्सर वैश्विक आईटी उद्योग का बैरोमीटर माना जाता है। कंपनी दुनिया भर के बड़े कॉरपोरेट ग्राहकों के साथ काम करती है और उसके नतीजे यह संकेत देते हैं कि वैश्विक कंपनियां टेक्नोलॉजी पर कितना खर्च करने जा रही हैं। हालिया नतीजों में Accenture ने बताया कि कई ग्राहक नए प्रोजेक्ट शुरू करने में देरी कर रहे हैं और खर्च को लेकर सावधानी बरत रहे हैं। कंपनी के आउटलुक ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। बाजार को लगा कि अगर Accenture को नए ऑर्डर मिलने में मुश्किल हो रही है तो आने वाले महीनों में भारतीय आईटी कंपनियों पर भी इसका असर दिख सकता है। यही वजह रही कि न्यूयॉर्क में Accenture का शेयर टूटा और अगले ही कारोबारी सत्र में भारतीय आईटी शेयरों में बिकवाली का तूफान आ गया।
एक जैसा है दोनों का बिजनेस मॉडल
भारतीय आईटी कंपनियां और Accenture अलग-अलग देश की कंपनियां जरूर हैं, लेकिन उनका कारोबार काफी हद तक एक जैसा है। दोनों बड़ी संख्या में इंजीनियरों और टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के जरिए कंपनियों को डिजिटल सेवाएं देती हैं। क्लाउड माइग्रेशन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, साइबर सिक्योरिटी, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे प्रोजेक्ट्स दोनों के लिए कमाई का प्रमुख स्रोत हैं। इसलिए जब वैश्विक मांग कमजोर पड़ती है तो असर केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे सेक्टर पर दिखाई देता है।
AI ने बढ़ाई नई चिंता
इस बार निवेशकों की चिंता सिर्फ कमजोर मांग नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी आईटी सेक्टर के सामने नई चुनौती बनकर उभरा है। पिछले कई दशकों से भारतीय आईटी कंपनियों का मॉडल ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती और ज्यादा प्रोजेक्ट्स पर आधारित रहा है। लेकिन AI आधारित कोडिंग टूल्स और ऑटोमेशन के बढ़ते इस्तेमाल से कई काम अब कम लोगों में पूरे हो रहे हैं। बाजार को डर है कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। कंपनियां AI आधारित सेवाओं में निवेश तो कर रही हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नई AI डील्स पुरानी पारंपरिक सेवाओं जितना राजस्व और मुनाफा दे पाएंगी या नहीं।
क्या यह सिर्फ अस्थायी गिरावट है?
Motilal Oswal के विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा दबाव न तो पूरी तरह से अस्थायी है और न पूरी तरह से स्थायी। फिलहाल सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ वैश्विक मांग कमजोर है, दूसरी तरफ कंपनियों को AI युग के हिसाब से खुद को बदलना पड़ रहा है। हालांकि, भारतीय आईटी कंपनियों के पास मजबूत ग्राहक आधार, बड़ी प्रतिभा क्षमता और वैश्विक स्तर पर स्थापित डिलीवरी नेटवर्क है। यही वजह है कि लंबी अवधि में सेक्टर की संभावनाएं अभी भी मजबूत मानी जा रही हैं।
कितना लुढ़का IT Sector?
Accenture के कमजोर आउटलुक के बाद भारतीय IT सेक्टर में बिकवाली का दबाव लगातार बना हुआ है। Nifty IT इंडेक्स सोमवार को 27,044 के आसपास बंद हुआ, जो इसके 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर 40,301 से करीब 33% नीचे है। इंडेक्स में केवल एक शेयर बढ़त में रहा जबकि नौ शेयर गिरावट के साथ बंद हुए। पिछले 6 महीनों में इंडेक्स लगभग 31%, साल 2026 में अब तक करीब 29% और एक साल में लगभग 30% टूट चुका है।

निफ्टी आईटी में बड़ी गिरावट
यह गिरावट बताती है कि निवेशक वैश्विक IT खर्च में सुस्ती, अमेरिकी बाजार पर भारतीय कंपनियों की निर्भरता और AI से पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंतित हैं।
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